रविवार, 24 फ़रवरी 2013

राम मंदिर के बाद रामसेतु -- हिन्दू आस्था पर कांग्रेस का इस्लामिक प्रहार (ram setu)




कांग्रेस  सरकार  अब नीचता और हिन्दू विरोध की  पराकाष्ठा  करते हुए  रामसेतु को तोड़ने के कार्य में युद्ध स्तर पर लग गयी है ..शायद चुनावों से पहले मज़बूरी में अफजल को दी गयी  फांसी का असर कम करने के लिए और मुसलमान वोटो की लालसा में रामसेतु को तोड़ने का कार्यक्रम बनाया जा रहा है ..इसी  कड़ी के अंतर्गत सरकार ने आरके पचौरी समिति की सिफारिशों को नकार दिया है।ये वही सरकार है जिसके मंत्री 2 लाख करोड़ रूपये का एक घोटाला करते हैं और अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर लाखो करोड़ जेहादियों को असलहा और बम खरीदने के लिए बाट देती है॥ कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा दे कर तर्क दिया है की

1 भारत की सरकार (कांग्रेस) किसी राम के अस्तित्व को नहीं मानती है अतः रामसेतु की बात निरर्थक है ॥जब कांग्रेस सरकार राम को नहीं मानती तो रामसेतु को कैसे मानेगी??

2 सरकार का दूसरा तर्क है की लगभग 800 करोड रुपए वो खर्च कर चुकी है अतः इस परियोजना को बंद नहीं किया जा सकता॥

पहले तर्क के बारे मे कांग्रेस के हलफनामे के मुताबिक केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पचौरी के नेतृत्व वाली समिति की रिपोर्ट पर विचार किया और उसकी सिफरिशों को नामंजूर कर दिया। सरकार ने सुनवाई के दौरान रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने पर कोई कदम उठाने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस पर फैसला करने को कहा था। सरकार ने कहा कि 2008 में दायर अपने पहले हलफनामे पर कायम है जिसे राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने मंजूरी दी थी। इससे पहले अप्रैल में केन्द्र सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि वह रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने में असमर्थ है।सरकार आतंकवादी अफजल के चश्मे और घड़ी को जेहादियों को देने की बात कर सकती है जिसे वो देशद्रोही संग्रहालय बनाये मगर उसे 100 करोड हिंदुस्थानियों की आस्था के प्रतीक रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने में दौरे आने लगते हैं ॥अब हिंदुओं को सोचना होगा की क्या सचमुच द्रोही कांग्रेसियों को अपने घर मे जगह देनी चाहिए जो "राम" जैसे पूज्य के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते हैं॥ क्या ये संभव है कांग्रेस का कोई भी देशद्रोही धर्मद्रोही सदस्य “दिग्विजय सिंह के इष्टदेव मुहम्मद साहब”  या अपनी “इटालियन मम्मी” के आस्था के प्रतीक "जीसस" के अस्तित्व पर प्रश्न उठाए ??
अंग्रेज़ो ने सर्वप्रथम हिंदुस्तान पर राज करने के लिए हिंदुस्थानी जनमानस के स्वाभिमान पर चोट की और उसे खतम किया जब व्यक्ति का स्वाभिमान मर जाए तो उसे एक जानवर जैसे रखकर ,पालकर ,प्रताड़ित करके जैसे चाहे वैसे कार्य लिया जा सकता है। इसी क्रम मे अंग्रेज़ो ने बेगार और सार्वजनिक कोड़े लगाने का कुकृत्य शुरू किया।  यही काम हिंदुओं के साथ कांग्रेस कर रही है हिंदुओं की आस्था का हर वो प्रतीक जो जरा भी स्वाभिमान उनमे पैदा करता हो उसे नष्ट करो ॥ अमरनाथ यात्रा का क्या हाल हुआ हम सब देख रहे हैं॥ रामलला रहेंगे तम्बू और बारिश मे और रामसेतु तोड़ा जाएगा। अगर कांग्रेस सरकार मे सचमुच इतना पौरुष बचा है तो क्यूँ नहीं जिस "राम" को काल्पनिक कहते हैं उसकी मूर्तियाँ अयोध्या से हटवा देते हैं? हैदराबाद मे मंदिरों मे घंटिया बजाए जाने पर प्रतिबंध भी हिन्दू स्वाभिमान को तोड़ने की कांग्रेस की एक कुटिल चाल है ॥हालांकि बिना सेतु को तोड़े भी वैकल्पिक तरीके से सेतु बनाया जा सकता है मगर कांग्रेस सेतु तोड़ने पर अडिग है क्यूकी सेतु के साथ साथ टूटेगा हिंदुओं का स्वाभिमान ,सेतु के टूटने के साथ कांग्रेस प्रहार करेगी लाखो वर्ष से हिंदुस्थान मे राम को भगवान मानने की आस्था पर, और सेतु के साथ टूटेगा साढ़े सोलह लाख वर्षों से भगवान राम की एक अमर धरोहर जो उस काल मे हमारी सिविल इंजीनियरिंग का अदभूत नमूना है । 

अब यदि कांग्रेस सरकार के दूसरे तर्क 850 करोड रुपए को ले तो क्या लाखों करोडो का घोटाला करने वाले कांग्रेसियों को लाखो साल पुराने हिन्दू स्मृति चिन्ह के लिए टैक्स के 850 करोड भी नहीं मिल रहे हैं और वो पैसे भी हमारे टैक्स के हैं ,हम हिंदुओं की मेहनत के ॥अब यदि कांग्रेस सरकार के दूसरे तर्क 850 करोड रुपए को ले तो क्या लाखों करोडो का घोटाला करने वाले कांग्रेसियों को लाखो साल पुराने हिन्दू स्मृति चिन्ह के लिए टैक्स के 850 करोड भी नहीं मिल रहे हैं और वो पैसे भी हमारे टैक्स के हैं ,हम हिंदुओं की मेहनत के ॥ अगर पैसे की बात है तो कल से दिग्विजय और राहुल गांधी कटोरा ले के खड़े हो जाएँ तो हिंदुस्तान के 100 करोड हिन्दू राम सेतु के लिए 100 रुपए भी देंगे तो रामसेतु का आर्थिक भार सरकार से खतम हो जाएगा और हिन्दू धर्म विरोधी कांग्रेसियों के लिए बख्सीश भी बच जाएगी.

सभी हिन्दू भाइयों को इस विषय पर गंभीरता पूर्वक सोचना होगा की आखिर कांग्रेस की ये साजिश क्या है 
? रोमकन्या सोनिया और कांग्रेसियों ने वेटिकन सीटी के आदेश मुस्लिम आतंकवाद पर आंखे मूँद ली  है इससे मुसलमान हिंदुओं को कमजोर करेंगे और अंततः पूर्वोत्तर की तरह हिंदुस्थान को एक ईसाई बहुल राज्य बनाया जाएगा॥
इसी क्रम मे कश्मीर 
,उत्तरप्रदेश,हैदराबाद,बिहार,पश्चिम बंगालऔर आसाम मे हुए हिंदुओं के नरसंहार एवं हिन्दू माताओं बहनो का शील भंग करना आता है । मुसलमानो को आर्थिक एवं राजनीतिक संरक्षण दे कर हिन्दू और हिन्दू अस्मिता को नष्ट करना कांग्रेस सरकार के प्रायोजित कार्यक्रम का प्रथम चरण है॥ अगले चरण मे धीरे धीरे ईसाई मशीनरियों द्वारा भारत का ईसाईकरण. दुखद ये है की कुछ हिन्दू धर्म के द्रोही सेकुलर लोग कांग्रेस के साथ इस साजिश मे शामिल हो गए हैं और कुछ हिन्दू कांग्रेस की इस साजिश को समझ नहीं पा  रहे हैं॥
अब यदि रामसेतु का आर्थिक पक्ष देखें तो ये कांग्रेस की दलाली खाने की एक और चाल है इसकी शुरुआत तब होती है, जब पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जोर्ज बुश भारत आये थे और एक सिविल न्यूक्लीयर डील पर हस्ताक्षर किये गए जिसके अनुसार अमरीका भारत को युरेनियम-235 देने की बात कही l उस समय पूरी मीडिया ने मनमोहन सिंह की तारीफों  के पुल बांधे और इस डील को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बताया, पर पीछे की कहानी छुपा ली गयी l  आप ही बताइए जो अमरीका 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाता है वो भारत पर इतना उदार कैसे हो गया की सबसे कीमती रेडियोएक्टिव पदार्थ  जिससे परमाणु हथियार बनाये जा सकते हैं,एकाएक भारत को बेचने के लिए तैयार हो गया ? दरअसल इसके पीछे की कहानी यह है की इस युरेनियम-235 के बदले मनमोहन सिंह ने यह पूरा थोरियम भण्डार अमरीका को बेच दिया जिसका मूल्य अमरीका द्वारा दिए गए  युरेनियम से लाखो गुना ज्यादा है l आपको याद होगा की इस डील के लिए मनमोहन सिंह ने UPA-1 सरकार को दांव पर लगा दिया था, फिर संसद में वोटिंग के समय सांसदों को खरीद कर अपनी सरकार बचायी थी l यह उसी कड़ी का एक हिस्सा है l  थोरियम का भण्डार भारत में उसी जगह पर है जिसे हम ‘रामसेतु’ कहते हैं, यह रामसेतु भगवान राम ने लाखों वर्ष पूर्व बनाया था, क्योंकि यह मामला हिन्दुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा था इसलिए मनमोहन सरकार ने इसे तोड़ने के बड़े बहाने  बनाये। जिसमें से एक बहाना यह था की रामसेतु तोड़ने से भारत की समय और धन की बचत होगी, जबकि यह नहीं बताया गया की इससे भारत को लाखों करोड़ की चपत लगेगी क्योंकि उसमें मनमोहन सिंह, कांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टी डीएमके का  निजी स्वार्थ था l  भारत अमरीका के बीच डील ये हुई थी की रामसेतु तोड़कर उसमें से थोरियम निकालकर अमरीका भिजवाना था तथा जिस कंपनी को यह थोरियम निकालने का ठेका दिया जाना था वो डीएमके के सदस्य टी आर बालू की थी। अभी यह मामला सुप्रीमकोर्ट में लंबित है l  इस डील को अंजाम देने के लिए मनमोहन (कांग्रेस) सरकार भगवान राम का अस्तित्व नकारने का पूरा प्रयास कर रही है, ओने शपथपत्रों में रामायण को काल्पनिक और भगवान राम को मात्र एक ‘पात्र’ बताती है और सरकार की कोशिश है की ये जल्द से  जल्द टूट जाये, जबकि अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा ने रामसेतु की पुष्टि अपनी रिपोर्ट में की है l  अतः यह जान लीजिये की अमरीका कोई मूर्ख नहीं है जिसे एकाएक भारत को समृद्ध बनाने की धुन सवार हो गयी है, यदि अमरीका 10 रुपये की चीज़ किसी को देगा तो  उससे 100 रुपये का फायदा लेगा, और इस काम को करने के लिए उन्होंने अपना दलाल भारत में बिठाया हुआ है जिसका नाम है "मनमोहन सिंह" l  अब केवल कैग रिपोर्ट का इंतज़ार है…जो कुछ दिनों में इस घोटाले की पुष्टि कर  देगी…. यदि 1.86 लाख करोड़ का कोयला घोटाला महाघोटाला है तो 48 लाख करोड़ के घोटाले को क्या कहेंगे ? आप ही बताइए।
हम सभी हिन्दू भाइयों को इस बात को समझना होगा की यदि आज राम सेतु तोड़ा गया तो ये सिर्फ एक ऐतिहासिक संरचना को तोड़ना नहीं होगा बल्कि हिंदुओं के धार्मिक आस्था पर चोट होगी॥ कहते हैं की इतिहास स्वयं को दोहराता है रामसेतु को तोड़ना ठीक उसी प्रकार है जैसे बाबर ने रामलला के मंदिर को तोड़ा था अंतर सिर्फ इतना ही है की इस बार बाबर के रूप मे “सोनिया’,”राहुल”,”दिग्विजय” और “चिदम्बरम” जैसे कांग्रेसियों की फौज है और राम मंदिर की जगह है रामसेतु......

"आशुतोष नाथ तिवारी"

स्रोत: APJकलाम साहब का इंटरव्यू,कांग्रेस का हलफनामा,अंतर्जाल सूचनाएँ ,गूगल ब्लाग्स

being hindu









बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

पीलिया का कारण एवं प्राकृतिक उपचार


पीलिया का  कारण:
वायरल हैपेटाइटिस या जोन्डिस को साधारण लोग पीलिया के नाम से जानते हैं। यह रोग बहुत ही सूक्ष्‍म विषाणु(वाइरस) से होता है। शुरू में जब रोग धीमी गति से व मामूली होता है तब इसके लक्षण दिखाई नहीं पडते हैं
, परन्‍तु जब यह उग्र रूप धारण कर लेता है तो रोगी की आंखे व नाखून पीले दिखाई देने लगते हैं, लोग इसे पीलिया कहते हैं।  जिन वाइरस से यह होता है उसके आधार पर मुख्‍यतः पीलिया तीन प्रकार का होता है वायरल हैपेटाइटिस ए, वायरल हैपेटाइटिस बी तथा वायरल हैपेटाइटिस नान ए व नान बी।  रोग का प्रसार कैसे?  यह रोग ज्‍यादातर ऐसे स्‍थानो पर होता है जहॉं के लोग व्‍यक्तिगत व वातावरणीय सफाई पर कम ध्‍यान देते हैं अथवा बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देते। भीड-भाड वाले इलाकों में भी यह ज्‍यादा होता है। वायरल हैपटाइटिस बी किसी भी मौसम में हो सकता है। वायरल हैपटाइटिस ए तथा नाए व नान बी एक व्‍यक्ति से दूसरे व्‍यक्ति के नजदीकी सम्‍पर्क से होता है। ये वायरस रोगी के मल में होतें है पीलिया रोग से पीडित व्‍यक्ति के मल से,  दूषित जल,  दूध अथवा भोजन द्वारा इसका प्रसार होता है।  ऐसा हो सकता है कि कुछ रोगियों की आंख, नाखून या शरीर आदि पीले नही दिख रहे हों परन्‍तु यदि वे इस रोग से ग्रस्‍त हो  तो अन्‍य रोगियो की तरह ही रोग को फैला सकते हैं।  वायरल हैपटाइटिस बी खून व खून व खून से निर्मित प्रदार्थो के आदान प्रदान एवं यौन क्रिया द्वारा फैलता है। इसमें वह व्‍यक्ति हो देता है उसे भी रोगी बना देता है। यहॉं खून देने वाला रोगी व्‍यक्ति रोग वाहक बन जाता है। बिना उबाली सुई और सिरेंज से इन्‍जेक्‍शन लगाने पर भी यह रोग फैल सकता है।  पीलिया रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्ति वायरस, निरोग मनुष्‍य के शरीर में प्रत्‍यक्ष रूप से अंगुलियों से और अप्रत्‍यक्ष रूप से रोगी के मल से या मक्खियों द्वारा पहूंच जाते हैं। इससे स्‍वस्‍थ्‍य मनुष्‍य भी रोग ग्रस्‍त हो जाता है।
पीलिया का प्राकृतिक उपचार
  1. पीलिया के रोगियों को ऐसा भोजन करना चाहिए जो कि आसानी से पच जाए जैसे खिचड़ी, दलिया, फल, सब्जियां आदि।
  2. पीलिया के रोगियों को मैदा, मिठाइयां, तले हुए पदार्थ, अधिक मिर्च मसाले, उड़द की दाल, खोया, मिठाइयां नहीं खाना चाहिए।
  3. रोगी को दिन में तीन बार एक एक प्लेट पपीता खिलाना चाहिए।
  4. नीम के पत्तों को धोकर इनका रस निकाले। रोगी को दिन में दो बार एक बड़ा चम्मच पिलाएँ। इससे पीलिया में बहुत सुधार आएगा।
  5. पीलिया के रोगी को लहसुन की पांच कलियाँ एक गिलास दूध में उबालकर दूध पीना चाहिए , लहसुन की कलियाँ भी खा लें। इससे बहुत लाभ मिलेगा।
  6. टमाटर पीलिया के रोगी के बहुत लाभदायक होता है। एक गिलास टमाटर के जूस में चुटकी भर काली मिर्च और नमक मिलाएं। यह जूस सुबह के समय लें। पीलिया को ठीक करने का यह एक अच्छा घरेलू उपचार है।
  7. इस रोग से पीड़ित रोगियों को नींबू बहुत फायदा पहुंचाता है। रोगी को 20 ml नींबू का रस पानी के साथ दिन में 2 से तीन बार लेना चाहिए। 
  8. एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच पिसा हुआ त्रिफला रात भर के लिए भिगोकर रख दें। सुबह इस पानी को छान कर पी जाएँ। ऐसा 12 दिनों तक करें।
आधा कप सफेद प्‍याज के रस में गुड़ और पिसी हल्‍दी मिला कर प्रात: वह शाम को पीने से पीलिया में लाभ होता है। छोटे प्‍याज को छील कर चौकोर काट कर सिरके या नींबू के रस में भिगो दें, ऊपर से नमक काली मिर्च डाल दें। पीलिया का यह शर्तियां इलाज है।

तोरई को धीमी आग में भूनें और फिर इसका भुरता बना लें। इसका रस निचोड़कर, थोड़ी मिश्री मिलाकर पिएं। यह पीलिया में अत्यंत लाभदायक होती है।

स्रोत: आयुर्वेदिक पुस्तके एवं अंतर्जाल पृष्ठ


बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

वैलेंटाइन डे(valentine day): प्रेम का पर्व या संस्कारों का अवमूल्यन :

वर्तमान महानगरीय परिवेश में पश्चिम का अन्धानुकरण करने की जो यात्रा शुरू हुई है उसका एक पड़ाव फ़रवरी महीने की १४ तारीख है,हालाँकि प्रेम की अभिव्यक्ति किसी भी प्रकार की हो सकती हैI माँ-बाप,बेटा,भाई,बहन किसी के लिए मगर ये त्यौहार वर्तमान परिवेश में प्रेमी प्रेमिकाओं के त्यौहार के रूप में स्थापित किया गया हैI आज कल के युवा या यूँ कह ले आज कल कूल ड्यूड्स बड़े जोर शोर से इस त्यौहार को मना कर आजादी के बाद भी, अपनी बौधिक और मानसिक गुलामी का परिचय देते मिल जायेंगे Iपिछले १५-२० वर्षों में इस त्यौहार ने भारतीय परिवेश में अपनी जड़े जमाना प्रारम्भ किया और अब इस त्यौहार के विष बेल की आड़ में हमारी युवा पीढ़ी में बचे खुचे हुए भारतीय संस्कारो का अवमूल्यन किया जा रहा हैI इस त्यौहार के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है में उनका जिक्र करके उनका विरोध या महिमामंडन कुछ भी नहीं करना चाहूँगा क्यूकी भारतीय परिवेश में ये पूर्णतः निरर्थक विषय हैI

मेरे मन में एक बड़ा सामान्य सा प्रश्न उठता है की प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए हम एक खास दिन ही क्यों चुने??जहाँ तक प्रेम के प्रदर्शन की बात है हमारे धर्म में प्रेम की अभिव्यक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है मीरा और राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम I मगर महिमामंडन वैलेंटाइन डे का?कई बुद्धिजीवी(या यूँ कह ले अंग्रेजों के बौधिक गुलाम) अक्सर ये कुतर्क करते दिखते हैं की इसे आप प्रेमी प्रेमिका के त्यौहार तक सीमित न करे, मेरी बेटी मुझे वैलेंटाइन की शुभकामनायें देती है,और पश्चिम में फादर डे,मदर डे भी मनाया जाता है I मेरा ऐसे बौधिक गुलाम लोगो से प्रश्न है की,अगर पश्चिम में मानसिक और बौधिक रूप से इतना प्रेम भरा पड़ा है की, वहां से प्रेम का त्यौहार, हमे उस धरती पर आयात करना पड़ रहा है जहाँ निष्काम प्रेम में सर्वस्व समर्पण की प्रतिमूर्ति मीराबाई पैदा हुई, तो पश्चिम में ओल्ड एज होम सबसे ज्यादा क्यों हैं?? क्यों पश्चिम  का निष्कपट प्रेम वहां होने वाले विवाह के रिश्तों को कुछ सालो से ज्यादा आगे नहीं चला पाता.उस प्रेम की मर्यादा और शक्ति तब कहा होती  है ,जब तक बच्चा अपना होश संभालता है ,तब तक उसके माता पिता कई बार बदल चुके होते हैं और जवानी से पहले ही वो प्रेम से परे एकाकी जीवन व्यतीत करता है I ये कुछ विचारणीय प्रश्न है उन लोगो के लिए जो पाश्चात्य सभ्यता की गुलामी में अपनी सर्वोच्चता का अनुभव करते हैं I
ये कैसी प्रेम की अनुभूति है जब पिता पुत्र  से कहता है की तुम्हारा कार्ड मिला थैंक्यू सो मच..और फिर वो एक दूसरे से सालो तक मिलने की जरुरत नहीं समझते I ये कौन से प्रेम की अभिव्यक्ति है जब प्रेमी प्रेमिका विवाह के समय अपने तलाक की तारीख भी निश्चित कर लेते हैं,और यही विचारधारा हम वैलेंटाइन डे:फादर डे मदर डे के रूप में आयात करके अपने कर्णधारो को दे रहे हैंI
मैं किसी धर्म या स्थान विशेष की मान्यताओं के खिलाफ नहीं कह रहा मगर  मान्यताएं वही होती है जो सामाजिक परिवेश में संयोज्य हो I आप इस वैलेंटाइन वाले प्रेम की अभिव्यक्ति सायंकाल किसी भी महानगर के पार्क में एकांत की जगहों पर देख सकते हैंI
क्या ये वासनामुक्त निश्चल प्रेम की अभिव्यक्ति है?? या ये वासना की अभिव्यक्ति हमारे परिवेश में संयोज्य है? शायद नहीं,तो इस त्यौहार का इतना महिमामंडन क्यों?? मेरे विचार से भारतीय परिवेश में प्रेम की प्रथम सीढ़ी वासना को बनाने में इस त्यौहार का भी एक योगदान होता जा रहा है I आंकड़े बताते हैं की वैलेंटाइन डे के दिन परिवार नियोजन के साधनों जैसे गर्भ निरोधक गोलियां,कंडोम आदि की की बिक्री बढ़ जाती हैI क्या इसी वीभत्स कामुक नग्न प्रदर्शन को आप वैलेंटाइन मनाने वाले बुद्धिजीवी प्रेम कहते हैं? 
इस अभिव्यक्ति में बाजारीकरण का भी बहुत हद तक योगदान है कुछ वर्षो तक १-२ दिन पहले शुरू होने वाली भेडचाल वैलेंटाइन वीक से होते हुए वैलेंटाइन मंथ तक पहुच गयी है. मतलब साफ़ है इस नग्न नाच के नाम पर उल जलूल  उत्पादों को भारतीय बाज़ार में भेजनाIटेड्डी बियर, ग्रीटिंग कार्ड से होते हुए,भारत में वैलेंटाइन का पवित्र प्यार कहाँ तक पहुच गया है नीचे एक विज्ञापन से आप समझ सकते हैं?? 


वस्तुतः ये वैलेंटाइन डे प्रेम की अभिव्यक्ति का दिन न होकर हमारे परिवेश में बाजारीकरण और अतृप्त लैंगिक इच्छाओं की पाशविक पूर्ति का एक त्यौहार बन गया है,जिसे महिमामंडित करके गांवों के स्वाभिमानी भारत को पश्चिम के  गुलामो  का इंडिया बनाने का कुत्षित प्रयास चल रहा हैIउमीद है की युवा पीढ़ी वैलेंटाइन डे के इतिहास में उलझने की बजाय गुलाम भारत के आजाद भारतीय विवेकानंद के इतिहास को देखेगी,जिन्होंने पश्चिम के आधिपत्य के दिनों में भी अपनी संस्कृति और धर्म का ध्वजारोहण शिकागो में कियाI



सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

लव जेहाद ----हिन्दू जनसँख्या का संतुलन बिगाड़ने की मदरसों की साजिश ?


लव- जेहाद की चर्चा पूरे देश में हाईकोर्ट से लेकर मिडिया तक में चर्चा का विषय बना हुआ है, अब हिन्दू समाज सोचने को मजबूर हो रहा है मुसलमानों की विश्वसनीयता कटघरे में है सरकारी आकडे के अनुसार १९५१-५२ में मदरसों की संख्या केवल ८८ थी सन २ हज़ार के दसक में यह संख्या २० हज़ार के आस -पास हो गयी उस फसल का परिणाम इस समय दिखाई दे रही है, इस समय मदरसों की संख्या एक लाख हो गयी है, भारत के प्रमुख शहरो के मदरसों में बड़ी संख्या में मोटर साईकिल रखी जाती है जिसका उपयोग लव जेहाद में प्रयोग किया जाता है पटना, मुजफ्फरपुर, लखनऊ जैसे शहरो में २५ से लेकर सौ मोटर साइकिल तक योजना बद्ध रखा जाता है प्रातः ८ से दस बजे -सायम कालेज बंद होने के समय कुछ लडको ( दाढ़ी बनाने, कपडा सिलने, पंचर बनाने वाले) को साधन उपलब्ध कराकर हिन्दू लडकियों के पीछे लगा दिया जाता है कालेज के सामने सौंदर्य प्रसाधन, मुस्लिम मोवाइल रिचार्ज की दुकान खोलता है और हिन्दू लडकियों के नंबर नोटकर उसका गलत उपयोग करता है यह सबकी योजना और पूंजी लगाने का काम स्थानीय मस्जिद करती है जो ISI की योजना का एक हिस्सा है .
       इस समय मदरसों से शिक्षित नवजवान जिन्हें इस्लाम का जूनून सवार रहता है शिक्षा समाप्त होने पर मदरसे में सपथ दिलाई जाती है कि इस्लाम ने तुम्हारे ऊपर इतना धन लगाया है तुम इस्लाम को क्या दोगे ? उसके उत्तर में उन्हें एक न एक हिन्दू लड़की से निकाह हेतु प्ररित किया जाता है फिर क्या है ? वे अपनी इस्लामिक उद्देश्य में जुट जाते है, अपना नाम राजू, टामी, कामी, बबलू इत्यादि रख लेते है हाथ में रक्षा सूत्र जैसा कुछ बाध लेते है जिससे पता ही नहीं चलता कि ये हिन्दू है या मुसलमान, चाहे केरल हो या कोई अन्य प्रदेश सभी जगह समान तरीके से लव जेहाद चलाया जा रहा है प्रति वर्ष एक लाख हिन्दू लडकियों को फसाकर निकाह के माध्यम से इस्लामीकरण किया जाता है फिल्म जगत में जितने खान बंधू है अथवा बीजेपी के अल्पसंख्यक नेता सभी हिन्दू लड़की से निकाह करना, बच्चे पैदा करना -छोड़ना और फिर दूसरी हिन्दू लड़की से निकाह करना आखिर ये सब क्या है ? क्या इन्हें मुस्लिम लड़की नहीं मिलती ?  केरल के हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि ''ये लव नहीं ये लव जेहाद है''.
           एक तरफ बंगलादेशियो के घुसपैठ की बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है गाव के सारे रोजगारो पर बंग्लादेसियो का कब्ज़ा हो गया है, दूसरी तरफ लव जेहाद की तमाम घटनाये आये दिन होती जा रही है मै झारखण्ड प्रदेश के प्रवास पर था वहा पर ग्रामीण क्षेत्र में मेरा रुकना हुआ तो यह समझ में आया की ये बीमारी कितना जड़ जमाये हुए है पहले तो केरल के हाईकोर्ट, अनेक पत्र- पत्रिकाओ ने कहा- लिखा इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने भी इस पर सवाल उठाये लेकिन झारखण्ड के पलामू जिले के क्षतरपुर विकाश खंड की घटना ने तो हिन्दू समाज को हिला कर रख दिया है, उस बिकाश खंड में मुस्लिम आवादी १५ प्रतिशत है ब्लाक केंद्र पर न के बराबर आस-पास कुछ मुस्लिम गाव भी है हिन्दुओ का स्वभाव उदारता का रहता ही है उसका लाभ उठाकर कोई मुस्लिम लड़का कोचिंग पढ़ने के बहाने आया तो पढने वाली लड़की को प्रेम जाल में फसाकर भगा ले गया यही नहीं तो कुछ लोग हिन्दुओ से सम्बन्ध बनाकर किराये पर दुकान लिया फिर उसी की लड़की भगा ले गया. रेंगनिया गाव के नागेन्द्र चंद्रबंसी की लड़की नेहा को मुबारक नाम के मुस्लिम युवक कोचिंग के बहाने ले गया, नवडीहा के रूबी कुमारी अखिलेश की लड़की को तवरेज अंसारी [नवडीहा], निरंजन कुमार सिंह की लड़की काजल को खालिर वही दुकान करते -करते भगा ले गया ये सारे घटना क्रम एक माह के भीतर के है हिन्दू समाज की बड़ी भयावह हो गयी है.
        इसमें मुसलमानों का कोई दोष नहीं है वे तो कुरान की आदेश का पालन कर रहे है कुरान कहता है की ''हे मोमिनो काफिरों की बहन-बेटिया तुम्हारे खेत की मूली है तुम जैसा चाहो वैसा उपयोग करो, आगे कुरान कहता है की काफिरों को कभी मित्र मत बनाओ जहा मिले उन्हें क़त्ल कर दो, इन्हें तब-तक मारते रहो जब-तक वे कलमा नहीं पढ़ ले''. इस्लाम अनुयायी तो अपना काम बड़ी ही बुद्धिमानी से कर रहे है वे हमारी बहन -बेटियों को भगाकर ले जा रहे है वह इस्लाम धर्म के प्रचार का एक बड़ा हिस्सा है, वे मित्र बनाते है तो अपने काम को साधने के लिए ---- लेकिन यदि हिन्दू अपने महापुरुषों की बात मानता तो यह भोगना नहीं पड़ता, गुरु गोविन्द सिंह कहते है.
      '' जन विस्वास करौ तुरुक्का'-----
        आगे कहा कि -------
        तुरुक मिताई तब करै, जब सबै हिंदु मरि जाय''.
        लेकिन हिन्दू कैसा है वह सेकुलर बन मुसलमानों को चिपकाये रहता है और धोखा पर धोका खाता रहता है यही हमारी नियति है.
             बड़े ही योजना बद्ध तरीके से हिन्दू समाज को नीचा दिखाने का काम हो रहा है यदि कोई हिन्दू लड़का किसी मुसलमान लड़की लेकर आता है तो पूरा इस्लाम में खतरा उत्पन्न हो जाता है सरकार को भी इसमें सांप्रदायिकता नज़र आने लगती है ये केवल हिंदुत्व की बात नहीं है यह धीरे -धीरे भारत को कमजोर करने की साजिस है आज सारे विश्व में इस्लाम आतंकबाद का पर्याय हो गया है भारत में इस्लाम को प्रेम-मुहब्बत का धर्म बताया जा रहा है लेकिन मदरसों की शिक्षा का प्रभाव अब दिखाई देने लगा है, अभी मुहर्रम पर लोहरदगा [झारखण्ड] में जुलुस निकालते हुए ''हम बाबरी मस्जिद वही बनायेगे के नारे लगाये'' पूरे बिहार में सरकार की तुष्टिकरण निति के कारन जहा ५-६ फुट लम्बी तलवार, भाला, काता, फरसा लेकर प्रदर्शन किया वही मुसलमानों का मनोबल इतना बढ़ गया कि पचासों स्थान पर हिन्दू समाज पर हमला किया एकतरफा दंगा करने का प्रयास शिवहर में पुलिस अधिकारियो पर हमला इसका सबूत है. यदि यह होता रहा तो धीरे-धीरे मुसलमानों का मनोबल और बढेगा फिर २-३ साल में हिन्दुओ पर हमला करना तेजी से शुरू कर देगे दंगे मुसलमानों और पुलिस के बीच होकर हिन्दुओ को लड़ने की प्रेरणा स्वयं मुसलमान ही आवाहन करेगे तब हिन्दू कहा तक भागेगा यह बिचार करने समय आ गया है, मुसलमानों का अंतिम उद्देश्य भारत का इस्लामी करण ही है  भारतीयों को बिचार करना है की क्या विश्व में जो इस्लामिक देश है वे बड़े सुखी -संपन्न है-? या आतंकबादी या और कुछ -----?    

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

BEING HINDU T SHIRTS AND BADGES

 BEING HINDU T shirts
 BEING HINDU
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जय श्री राम जय हिन्दू राष्ट्र ...  



रविवार, 3 फ़रवरी 2013

प्रगतिवादी मुस्लिम की व्यथा


कट्टरता से भला भी हो सकता है बुरा भी, यदि कट्टरता सकारत्मक हो तो परिवेश बदल सकता है, नकारात्मक  हो तो विध्वंशक हो जाता है.

बाबरी मस्जिद काण्ड नकारत्मक कट्टरता का ही एक नमूना है, उसका इतिहास चाहे जो भी रहा हो, भले ही वह हमारे धर्म से सम्बन्धित न रहा हो, लेकिन फिर भी वह हमारी धरोहर है, क्योकि भारत में है, हमारे देश में है और हिन्दू मुसलमान सबका है. लेकिन इसी तर्ज पे कट्टरवादी मुसलमान चार हाथ और आगे है, हाल में ही शांति के प्रतिक बुद्ध जी की प्रतिमा का लखनऊ में तोड़े जाना इसी  बात का प्रतिक है, मुसलमान दशको पहले बाबरी का रोना तो रोते हैं लेकिन ठीक वही काम वो आजतक करते आ रहे हैं.
 इन सब के पीछे क्या कारण है ? कुरआन ? क्योकि मुल्ले (मुसलमान नहीं ) हर बात पे ईश्वरीय वाणी का हवाला दे हर बात पे बरगलाते हैं. ये हर मुसलमान के मन में भर दिया जाता है की कुरआन ईश्वरीय वाणी है. सारी जड बस यहीं से शुरू होती है.

जिस समय कुरआन की रचना हुयी उसका उद्देश्य बड़ा स्पष्ट था, मानव जाती को सुधारना न की बिगड़ना. इसी सोच के साथ उन्होंने कुरआन की रचना की. उन दिनों अरब में शिखर तक लुट मार और पापाचार फैला हुआ था, औरतो का बिकना, हत्या, लूटमार, वहां का लोकाचार था. जिससे मोहम्मद दुखी रहा करते थे, शायद  वो एक सदात्मा थे .. तब उन्होंने अरब वासियों को सुधारने के लिए कुरआन लिखा (लिखवाया).

और अपने विचारो से सबको अवगत करने की सोची.लेकिन बदलाव किसको पसंद है ? लोगो ने विरोध किया, यहाँ तक की लोग मोहम्मद के दुश्मन भी हो गए, मोहम्मद भागे भागेफिरने लगे, फिर उन्हें एक उपाय सुझा, क्यों न इश्वर  का सहारा ले कर इनको इंसान बनाया जाए, कहते हैं न की हिम्मते मरदा मददे खुदा, फिर उन्होंने अपनी बातो को इश्वर वाणी बताई ताकि कम से लोग उनको सुने, यदि  मन मात्र के भले के लिए कोई झूठ बोले तो उसे पाप नहीं माना जा सकता.जिससे लोगो में बदलाव हुआ, लोग रस्ते पे आना शुरू हुए. उनको ये नहीं पता था की  मानव इतना नीच है की उनके जाने के बाद कालांतर में ये मानव अपने कुकर्मो का बिल भी उन्ही के नाम पे फाडेगा. बाद में स्वार्थी मुल्ले मौलवी मोहमद के नाम पर ही उल जलूल व्याख्या कर लोगो को कट्टर बनाने का काम शुरू किया सिर्फ अपने फायदे के लिए, बिना ये समझे की मोहम्मद ने इसको इश वाणी का नाम क्यों दिया. किसी भी चीज के दो पहलू होते है, इश्वर के नाम पे सुधार की शुरुवात मोहम्मद ने  की और बिगाड़ की शुरुवात इनके स्वार्थी अनुयायियों ने.

कुरआन पढ़ने से स्पष्ट मालूम पड़ता  है की वो सिर्फ अरब वासियों को ध्यान में रख कर बनाया गया था. अब आप ही सोचिये यदि कुरआन भगवान्/परमेश्वर का होता तो सिर्फ अरब आधारित क्यों लिखा जता ?? सारे तथ्यों का आधार अरब ही क्यों होता ? या तो उसमे पूरी दुनिया के बन्दों को मुसलमान मानना चाहिए क्योकि इश्वर ने सारे दुनिया के हर इंसान, जीव को बनाया है.  लेकिन उसमे गैर मुसलमान का जिक्र क्यों ?? क्या बाकी भगवान् के पुत्र/या उनके बनाये नहीं है ? क्या इश्वर कभी ये कह सकता है की तुम मेरे बेटे हो और वो नहीं ? क्या इश्वर भी धर्मांध हो सकता है. हाँ  चाहे तो वो ये कह सकता था की अच्छा मुसलमान और बुरा मुसलमान, बुरे मुसलमान अपने पे ईमान लाये, न की इश्वर "गैर मुसलमान" शब्द का प्रयोग करता. क्या इश्वर मानव को दो भागो में विभक्त करना चाहता था ?  भाई धर्म अच्छी चीज है, उसका उपयोग गलत और सही हो सकता है. धरम ग्रन्थ हमारे लिए हैं हम धर्म ग्रंथो के लिए नहीं,  ठीक वैसे ही जैसे ताला चाभी घर के लिए बनाया जाता है, किसी घर को ताला चाभी के लिए नहीं बनाया जाता, क्योकि यदि हम धर्म के नाम पर धर्मांध हो गए तो हमारा फायदा, मुल्ले/पंडित/ पादरी और इन सबके पिता जी - नेता लोग उठा ले जाते है..और हमारे दिमाग में भी ये बाते बस इसीलिए भरी जाती है की हम इनके लगाम में रहे है.

कालांतर में कुरआन में गुपचुप तरीके से न जाने कितने बदलाव हुए लेकिन ये बाहर नहीं आने दिया जाता की हमने कुछ बदलाव किया है, वो बदलाव नकारात्मक है.इन मुल्लो की परेशानी ये थी कुरआन को पूरी तरह से बदल भी नहीं सकते थे, क्योकि कुरआन आते ही कुछ अच्छे आलिम लोगो के हाथ में भी पहुची, वो इन मुल्लो का पोल खोल देते, इसलिए इन मुल्लो ने बड़े सुनियोजित ढंग से कुरआन में चुपके चुपके बदलाव किया. कई पीदियो तक.... मेरी बात की सत्यता जाचना चाहते हैं तो कुरआन की ही कई लेखको द्वारा टीका पढ़िए, सबने अपने अपने हिसाब से टिका  लिखा है. ये हाल सिर्फ कुरआन के साथ ही नहीं बाकी सारे धर्म ग्रंथो के साथ भी है . तो जब बदलाव हो ही रहा है तो सकारत्मक क्यों न हो. क्यों हम इश्वर के पाँव में जंजीर जंजीर बाध् उनको भी अपने बुरे कामो में घसीटते रहे ?

कुरआन बस एक साहित्य है, किसी के अपने निजी विचार, जो मानव मात्र के भलाई के लिए बनायीं गयी और असरदार ढंग से काम करे इसलिए इश्वर का सहारा लिया गया. इससे जादा और कुछ नहीं ये कोई इश्वर की किताब नहीं. अब मुसलमान भाई कहते हैं, की कुरआन जैसी एक आयत लाओ जो "डिफरेंट" हो. भाई हर लेखक  अपना विचार होता है. अब मई ये कहूँ की तुम प्रेमचंद्र जैसी जैसे कोई एक कहानी लाओ, बिलकुल डिफरेंट, माने लोचा , कुरआन जैसी भी हो और डिफरेंट भी हो. अजब दिल्लगी है भाई.

फिर कहते हैं हिन्दू को धर्म नहीं, रामायण या गीता में कहीं भी इस शब्द का कोई उपयोग नहीं. बिलकुल सत्य वचन. हमारे परिवेश के कारन  हमें हिन्दू कहा गया. और रामायण और गीता में हिन्दू या किसी धर्म का नाम न होना ही उसका बड़प्पन है. क्योकि ये साहित्य मानव मात्र के कल्याण  के लिए है न की किसी विशेष धर्म या समुदाय के लिए.और इसके विपरीत कुरआन में मुसलमान का जिक्र आया है क्योकि उस जगह की परिस्थितिया और अरब जगह मुसलमान ही थे. मोहम्मद साहब ने बस इस शब्द का उपयोग न कर "बुरे" या "अच्छा"  मानव का शब्द इजाद किया होता तो शायद ही आज कोई वैमनस्यता होती. मुसलमान भाई भी कहते है की कुरआन किसी धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बजाय इसके की यही सबसे उच्च धर्म है,और मुसलमान सबसे बेहतर है.

 हम बेहतर है" वाला ऐटीटयूट भी गलत नहीं है, बशर्ते इसी को कर्मो द्वरा पूरा किया जाये बजाय की दुसरे धर्मो और उनके प्रतीक चिन्हों पे आघात करना, जरा सोचिये किसी की भावनावो पे चोट कर क्या आप इश्वर को खुश कर सकते हैं ? जरा सोचिये दुनिया की तस्वीर क्या होगी जब "हम बेहतर है" दिखाने के लिए सारे धर्म वाले आपस में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा बेहतर से बेहतर कार्य के लिए करे. मुसलमान कहे हम बेहतर है  हमने १० को सहारा दिया, हिन्दू कहे की नहीं भाई हम भी है, हमने भी ५ को सामर्थ्यनुसार तो सहारा दिया है, इसाई कहे की हम ३ का पालन पोषण करते है. बुराई तब आ जाती है जब हम बिना कुछ किये दुसरे को कहने लगते है की तुम खराब हो.

एक प्रगतिवादी मुसलमान भाई के दिल की कसक ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ :-
एक बात जो इस्लाम में बहस का मुद्दा हो सकती है या कहुं की सरे मज़हब का सुधर कर सकती है की क्या कुरआन और शरियत के बहार जाया जा सकता है क्या आज के समय के हिसाब से चला जा सकता है , तो में यही कहूँगा ( चाहे इसके बाद मेरे खिलाफ फतवों की बारिश भी हो जाये ) हाँ बिलकुल जाना चाहिए , और ये मुहम्मद सल्लालाहू अ.व ने भी कहा था की जब किसी नतीजे पर न जा सको तो अपने दिमाग से काम लेना हो सकता है हर बात का जवाब कुरान या हदीस न दे पाए. एक समय जो इस्लाम का सुनहरा दौर कहा जाता है उस वक्त तब एक शब्द का ज्यादा इस्तेमाल होता था एवं उसे ‘इज्तीहाद कहा जाता था। इस शब्द का अर्थ है स्वतंत्र चिन्तन। व्यवहार में यह शब्द हर आदमी औरत को यह आज़ादी देता था कि वे महजबी सीखों को आज के दौर की कसौटी पर कसें एवं फिर उन पर अमल करें। किन्तु जैसे-जैसे मुस्लिम साम्राज्य स्पेन से बगदाद तक फैला मुफ्तियों ने इस सल्तनत की रक्षा के लिए स्वतंत्र चिन्तन के द्वार बन्द कर दिये। इस तर्क एवं चिन्तन का स्थान फतवों ने ले लिया एवं मुसलमानों को सिखाया गया कि वे खुद सोचने की जगह इन फतवों पर अमल करें। इस्लाम के वर्तमान युग की त्रासदी यही है कि मुसलमान अपने दिमाग में उठने वाले सवालों को खुले में उठाने से डरते हैं एवं मुल्ला मौलवियों द्वारा जो कुछ भी कहा जाता है उस पर अमल करते हैं। और यही सरे फसाद की जड़ है ,
मेरा सभी मुसलमान भाई और बहनों से निवेदन है की ज़रा इस बात पर ज़रूर गौर करें.

अगर हम अपने उलेमा, राजनीतिज्ञों एवं मुल्लावों की तकरीरों को सुने तो वे हमेशा पश्चिमी सभ्यता के खोट गिनाते दिखेंगे किन्तु वही मुल्ला एवं पालिटीशियन अपने बच्चों को अमेरिका के स्कूल एवं कॉलेजों में दाखिले के लिए जमीन आसमान एक किये रहते हैं। तमाम अमीर मुसलमान परिवार पश्चिम में छुट्टियाँ मनाते नजर आते हैं। यहाँ तक कि धन से भरपूर खाड़ी के देशों में भी वहाँ की अवाम अपने को सोने के पिंजरे में बन्द महसूस करती है। आखिर क्या वजह है कि इस्लाम रचनात्मकता, नई सोच और मानवाधिकारों का गला घोटने वाला मजहब बन गया है। पाकिस्तान १९४७ में वजूद में आया था लेकिन एक साल बाद जन्म लेने वाले इजराइल से कहीं पीछे रह गया है।इस्लाम के पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस मजहब का जन्म अरब में हुआ जहाँ घुमन्तु रेगिस्तानी कबीले रहा करते थे। कबीलों की एक विशेष संस्कृति होती है। उनका अस्तित्व किसी शेख का हुकुम मानने पर निर्भर करता है। वहाँ मर्द राज करता है एवं औरत की कोई अहमियत नहीं होती।
आज भी अरब लोग खुद को असली मुसलमान और बाकी इस्लामी दुनिया को धर्मान्तरित मुसलमान समझते हैं। बाकी दुनिया के मुसलमान भी इसी अरबी मानसिकता को पालने एवं रीति रिवाजों की नकल करना चाहते हैं। मांजी का मत है कि मुस्लिम जगत पर औरतों की यह पकड़ दुनिया का सबसे बड़ा उपनिवेशवाद है। इक्कीसवीं सदी में जरूरत इस बात की है कि दुनिया के बाकी मुसलमान अरबों की इस कबीलाई सोच एवं रीति रिवाजों से छुटकारा पायें।
आप अरबी मुसलमान नहीं हैं आप हिन्दुस्तानी मुसलमान हैं और हमको चाहिए की जो रिवाज हमारे हैं अगर हम गोर करें तो कहीं भी इस्लाम के खिलाफ नहीं हैं बल्कि अरब मुल्कों से कहीं ज्यादा बेहतर हमारे मुल्क के रिवाज हैं हमको खुद को अपने मज़हबी दायरे में रहकर खुद में बदलाव लाना चाहिए जो आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है.
अगर किसी को मेरी बात से दुःख या ठेस लगे तो माफ़ करना लेकिन हकीकत से मुहं छुपाना कायरता होती है.
लेखक: कमल कुमार सिंह "नारद"