गुरुवार, 28 मार्च 2013

आजाद हिंदुस्थान के गुलाम क़ानून(British colonial law in indian constitusion)


1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में हिस्सा 33% था, दुनिया के कुल उत्पादन का 43% भारत में पैदा होता था और दुनिया के कुल कमाई में भारत का हिस्सा 27% था | ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए
आधिकारिक तौर पर भारत को लुटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के बाद तैयार हुई थी, उस बहस में ये तय हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारी दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा" |
तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 350% मतलब 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 350 रुपया Excise Duty देना होगा | फिर अंग्रेजों ने समान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 120% मतलब 100 रुपया का माल बेचो तो 120 रुपया CST दो |
फिर एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 97% मतलब 100 रुपया कमाया तो 97 रुपया अंग्रेजों को दे दो | ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार का टैक्स लगाया अंग्रेजों ने और खूब लुटा इस देश को | 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लुटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि करीब 300 लाख करोड़ रुपया लुटा अंग्रेजों ने इस देश से | तो भारत की जो गरीबी आयी है वो लुट में से आयी गरीबी है | विश्व व्यापार में जो हमारी हिस्सेदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे कारखाने बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे मजदूर बेरोजगार हो गए | इस तरीके से बेरोजगारी पैदा हुई, गरीबी-बेरोजगारी से भुखमरी पैदा हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं था बल्कि अंग्रेजों के ख़राब कानून से पैदा हुए अकाल थे, और इन कानूनों की वजह से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे | तो हमारी गरीबी का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक,अध्यात्मिक या सामाजिक कारण नहीं है | हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का जिक्र करना तो मुश्किल है लेकिन कुछ मुख्य कानूनों के बारे में मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ |

Indian Education Act - 1858 में Indian Education Act बनाया गया | इसकी    ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकोले ने की थी | लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के    शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के    शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी | अंग्रेजों का एक अधिकारी था    G.W.Litnar और दूसरा था Thomas Munro, दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय    सर्वे किया था | 1823 के आसपास की बात है ये | Litnar , जिसने उत्तर भारत का    सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण    भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है, और उस समय जब    भारत में इतनी साक्षरता है | और मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को    हमेशा-हमेशा  के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा    व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा    व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से  अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में    काम करेंगे, और मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है "कि जैसे किसी खेत में  कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और  अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी " | इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता  जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी  घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा  दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला | 1850 तक इस देश  में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे 7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में Higher Learning Institute हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया   जाता था, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे न कि राजा, महाराजा, और इन
   गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी | इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म  किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला  कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास  यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं | और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है

   वो, उसमे वो लिखता है कि "इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे  में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी "

और उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब  साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा  बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम  तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा | लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है | शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है | इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे | ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की  भाषा अरमेक थी | अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती  थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में  होता है | जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही   मैकोले की रणनीति थी |

Indian Police Act - 1860 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया | 1857 के  पहले अंग्रेजों की कोई पुलिस नहीं थी इस देश में लेकिन 1857 में जो विद्रोह हुआ  उससे डरकर उन्होंने ये कानून बनाया ताकि ऐसे किसी विद्रोह/क्रांति को दबाया जा  सके | अंग्रेजों ने इसे बनाया था भारतीयों का दमन और अत्याचार करने के लिए | उस पुलिस को विशेष अधिकार दिया गया | पुलिस को एक डंडा थमा दिया गया और ये अधिकार  दे दिया गया कि अगर कहीं 5 से ज्यादा लोग हों तो वो डंडा चला सकता है यानि लाठी  चार्ज  कर सकता है और वो भी बिना पूछे और बिना बताये और पुलिस को तो Right to  Offence  है लेकिन आम आदमी को Right to Defense नहीं है | आपने अपने बचाव के लिए  उसके डंडे को पकड़ा तो भी आपको सजा हो सकती है क्योंकि आपने उसके ड्यूटी को पूरा  करने में व्यवधान पहुँचाया है और आप उसका कुछ नहीं कर सकते | इसी कानून का  फायदा उठा कर लाला लाजपत राय पर लाठियां चलायी गयी थी और लाला जी की मृत्यु हो  गयी थी और लाठी चलाने वाले सांडर्स का क्या हुआ था ? कुछ नहीं, क्योंकि वो अपनी ड्यूटी कर रहा था और जब सांडर्स को कोई सजा नहीं हुई तो लालाजी के मौत का बदला भगत सिंह ने सांडर्स को गोली मारकर लिया था | और वही दमन और अत्याचार वाला  कानून "इंडियन पुलिस एक्ट" आज भी इस देश में बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले चल  रहा है | और बेचारे पुलिस की हालत देखिये कि ये 24 घंटे के कर्मचारी हैं उतने  ही तनख्वाह में, तनख्वाह मिलती है 8 घंटे की और ड्यूटी रहती है 24 घंटे की | और  जेल मैनुअल के अनुसार आपको पूरे कपडे उतारने पड़ेंगे आपकी बॉडी मार्क दिखाने के   लिए भले ही आपका बॉडी मार्क आपके चेहरे पर क्यों न हो | और जेल के कैदियों को  अल्युमिनियम के बर्तन में खाना दिया जाता था ताकि वो जल्दी मरे, वो अल्युमिनियम  के बर्तन में खाना देना आज भी जारी हैं हमारे जेलों में, क्योंकि वो अंग्रेजों  के इस कानून में है |
Indian Civil Services Act - 1860 में ही इंडियन सिविल सर्विसेस एक्ट    बनाया गया | ये जो Collector हैं वो इसी कानून की देन हैं | भारत के Civil Servant जो हैं उन्हें Constitutional Protection है, क्योंकि जब ये कानून बना   था उस समय सारे ICS अधिकारी अंग्रेज थे और उन्होंने अपने बचाव के लिए ऐसा कानून  बनाया था, ऐसा विश्व के किसी देश में नहीं है, और वो कानून चुकी आज भी लागू है   इसलिए भारत के IAS अधिकारी सबसे निरंकुश हैं | अभी आपने CVC थोमस का मामला देखा   होगा | इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता | और इन अधिकारियों का हर तीन साल पर  तबादला हो जाता था क्योंकि अंग्रेजों को ये डर था कि अगर ज्यादा दिन तक कोई   अधिकारी एक जगह रह गया तो उसके स्थानीय लोगों से अच्छे सम्बन्ध हो जायेंगे और वो ड्यूटी उतनी तत्परता से नहीं कर पायेगा या उसके काम काज में ढीलापन आ जायेगा  | और वो ट्रान्सफर और पोस्टिंग का सिलसिला आज भी वैसे ही जारी है और हमारे यहाँ   के कलक्टरों की जिंदगी इसी में कट जाती है | और ये जो Collector होते थे उनका  काम था Revenue, Tax, लगान और लुट के माल को Collect करना इसीलिए ये Collector   कहलाये और जो Commissioner होते थे वो commission पर काम करते थे उनकी कोई  तनख्वाह तय नहीं होती थी और वो जो लुटते थे उसी के आधार पर उनका कमीशन होता था  | ये मजाक की बात या बनावटी कहानी नहीं है ये सच्चाई है इसलिए ये दोनों  पदाधिकारी जम के लूटपाट और अत्याचार मचाते थे उस समय | अब इस कानून का नाम  Indian Civil Services Act से बदल कर Indian Civil Administrative Act हो गया है, 64 सालों में बस इतना ही बदलाव हुआ है|

Indian Income Tax Act - इस एक्ट पर जब ब्रिटिश संसद में चर्चा हो रही   थी तो एक सदस्य ने कहा कि "ये तो बड़ा confusing है, कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा    रहा है"तो दुसरे ने कहा कि हाँ इसे जानबूझ कर ऐसा रखा गया है ताकि जब भी    भारत के लोगों को कोई दिक्कत हो तो वो हमसे ही संपर्क करें | आज भी भारत के आम  आदमी को छोडिये, इनकम टैक्स के वकील भी इसके नियमों को लेकर दुविधा की स्थिति  में रहते हैं | और इनकम टैक्स की दर रखी गयी 97% यानि 100 रुपया कमाओ तो 97 रुपया टैक्स में दे दो और उसी समय ब्रिटेन से आने वाले सामानों पर हर तरीके के टैक्स की छुट दी जाती है ताकि ब्रिटेन के माल इस देश के गाँव-गाँव में पहुँच  सके | और इसी चर्चा में एक सांसद कहता है कि "हमारे तो दोनों हाथों में लड्डू  है, अगर भारत के लोग इतना टैक्स देते हैं तो वो बर्बाद हो जायेंगे या टैक्स की  चोरी करते हैं तो बेईमान हो जायेंगे और अगर बेईमान हो गए तो हमारी गुलामी में आ  जायेंगे और अगर बरबाद हुए तो हमारी गुलामी में आने ही वाले है" | तो ध्यान  दीजिये कि इस देश में टैक्स का कानून क्यों लाया जा रहा है ? क्योंकि इस देश के  व्यापारियों को, पूंजीपतियों को, उत्पादकों को, उद्योगपतियों को, काम करने  वालों को या तो बेईमान बनाया जाये या फिर बर्बाद कर दिया जाये, ईमानदारी से काम  करें तो ख़त्म हो जाएँ और अगर बेईमानी करें तो हमेशा ब्रिटिश सरकार के अधीन  रहें | अंग्रेजों ने इनकम टैक्स की दर रखी थी 97% और इस व्यवस्था को 1947 में  ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आपको जान के ये आश्चर्य होगा कि  1970-71 तक इस देश में इनकम टैक्स की दर 97% ही हुआ करती थी | और इसी देश में भगवान श्रीराम जब अपने भाई भरत से संवाद कर रहे हैं तो उनसे कह रहे है कि प्रजा पर ज्यादा टैक्स नहीं लगाया जाना चाहिए और चाणक्य ने भी कहा है कि टैक्स ज्यादा   नहीं होना चाहिए नहीं तो प्रजा हमेशा गरीब रहेगी, अगर सरकार की आमदनी बढ़ानी है   तो लोगों का उत्पादन और व्यापार बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करो | अंग्रेजों ने   तो 23 प्रकार के टैक्स लगाये थे उस समय इस देश को लुटने के लिए, अब तो इस देश  में VAT को मिला के 64 प्रकार के टैक्स हो गए हैं | महात्मा गाँधी के देश में  नमक पर भी टैक्स हो गया है और नमक भी विदेशी कंपनियां बेंच रही हैं, आज अगर  गाँधी जी की आत्मा स्वर्ग से ये देखती होगी तो आठ-आठ आंसू रोती होगी कि जिस देश  में मैंने नमक सत्याग्रह किया कि विदेशी कंपनी का नमक न खाया जाये आज उस देश  में लोग विदेश कंपनी का नमक खरीद रहे हैं और नमक पर टैक्स लगाया जा रहा है शायद हमको मालूम नहीं है कि हम कितना बड़ा National Crime कर रहे हैं |


Indian Forest Act - 1865 में Indian Forest Act बनाया गया और ये लागू   हुआ 1872 में | इस कानून के बनने के पहले जंगल गाँव की सम्पति माने जाते थे और   गाँव के लोगों की सामूहिक हिस्सेदारी होती थी इन जंगलों में, वो ही इसकी देखभाल   किया करते थे, इनके संरक्षण के लिए हर तरह का उपाय करते थे, नए पेड़ लगाते थे  और इन्ही जंगलों से जलावन की लकड़ी इस्तेमाल कर के वो खाना बनाते थे | अंग्रेजों  ने इस कानून को लागू कर के जंगल के लकड़ी के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया साधारण आदमी अपने घर का खाना बनाने के लिए लकड़ी नहीं काट सकता और अगर काटे तो    वो अपराध है और उसे जेल हो जाएगी, अंग्रेजों ने इस कानून में ये प्रावधान किया  कि भारत का कोई भी आदिवासी या दूसरा कोई भी नागरिक पेड़ नहीं काट सकता और आम  लोगों को लकड़ी काटने से रोकने के लिए उन्होंने एक पोस्ट बनाया District Forest  Officer जो उन लोगों को तत्काल सजा दे सके, उसपर केस करे, उसको मारे-पीटे लेकिन दूसरी तरफ जंगलों के लकड़ी की कटाई के लिए ठेकेदारी प्रथा लागू की गयी जो  आज भी लागू है और कोई ठेकेदार जंगल के जंगल साफ़ कर दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता अंग्रेजों द्वारा नियुक्त ठेकेदार जब चाहे, जितनी चाहे लकड़ी काट सकते हैं | हमारे देश में एक अमेरिकी कंपनी है जो वर्षों से ये काम कर रही है, उसका नाम है   ITC पूरा नाम है Indian Tobacco Company इसका असली नाम है American Tobacco Company, और ये कंपनी हर साल 200 अरब सिगरेट बनाती है और इसके लिए 14 करोड़ पेड़  हर साल काटती है | इस कंपनी के किसी अधिकारी या कर्मचारी को आज तक जेल की सजा  नहीं हुई क्योंकि ये इंडियन फोरेस्ट एक्ट ऐसा है जिसमे सरकार के द्वारा अधिकृत  ठेकेदार तो पेड़ काट सकते हैं लेकिन आप और हम चूल्हा जलाने के लिए, रोटी बनाने  के लिए लकड़ी नहीं ले सकते और उससे भी ज्यादा ख़राब स्थिति अब हो गयी है, आप  अपने जमीन पर के पेड़ भी नहीं काट सकते | तो कानून ऐसे बने हुए हैं कि साधारण  आदमी को आप जितनी प्रताड़ना दे सकते हैं, दुःख दे सकते है, दे दो विशेष आदमी को  आप छू भीं नहीं सकते | और जंगलों की कटाई से घाटा ये हुआ कि मिटटी बह-बह के   नदियों में आ गयी और नदियों की गहराई को इसने कम कर दिया और बाढ़ का प्रकोप   बढ़ता गया |


Indian Penal Code - अंग्रेजों ने एक कानून हमारे देश में लागू किया  था जिसका नाम है Indian Penal Code (IPC ) | ये Indian Penal Code अंग्रेजों के एक और गुलाम देश Ireland के Irish Penal Code की फोटोकॉपी है, वहां भी ये IPC   ही है लेकिन Ireland में जहाँ "I" का मतलब Irish है वहीं भारत में इस "I" का   मतलब Indian है, इन दोनों IPC में बस इतना ही अंतर है बाकि कौमा और फुल स्टॉप   का भी अंतर नहीं है | अंग्रेजों का एक अधिकारी था .वी.मैकोले, उसका कहना था    कि भारत को हमेशा के लिए गुलाम बनाना है तो इसके शिक्षा तंत्र और न्याय  व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त करना होगा | और आपने अभी ऊपर Indian Education  Act पढ़ा होगा, वो भी मैकोले ने ही बनाया था और उसी मैकोले ने इस IPC की भी  ड्राफ्टिंग की थी | ये बनी 1840 में और भारत में लागू हुई 1860 में |   ड्राफ्टिंग करते समय मैकोले ने एक पत्र भेजा था ब्रिटिश संसद को जिसमे उसने  लिखा था कि "मैंने भारत की न्याय व्यवस्था को आधार देने के लिए एक ऐसा कानून  बना दिया है जिसके लागू होने पर भारत के किसी आदमी को न्याय नहीं मिल पायेगा |   इस कानून की जटिलताएं इतनी है कि भारत का साधारण आदमी तो इसे समझ ही नहीं सकेगा  और जिन भारतीयों के लिए ये कानून बनाया गया है उन्हें ही ये सबसे ज्यादा तकलीफ  देगी | और भारत की जो प्राचीन और परंपरागत न्याय व्यवस्था है उसे जडमूल से  समाप्त कर देगा"| और वो आगे लिखता है कि " जब भारत के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा तभी हमारा राज मजबूती से भारत पर स्थापित होगा" | ये हमारी न्याय  व्यवस्था अंग्रेजों के इसी IPC के आधार पर चल रही है | और आजादी के 64 साल बाद  हमारी न्याय व्यवस्था का हाल देखिये कि लगभग 4 करोड़ मुक़दमे अलग-अलग अदालतों में  पेंडिंग हैं, उनके फैसले नहीं हो पा रहे हैं | 10 करोड़ से ज्यादा लोग न्याय के  लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं लेकिन न्याय मिलने की दूर-दूर तक सम्भावना नजर  नहीं आ रही है, कारण क्या है ? कारण यही IPC है | IPC का आधार ही ऐसा है | और   मैकोले ने लिखा था कि "भारत के लोगों के मुकदमों का फैसला होगा, न्याय नहीं   मिलेगा" | मुक़दमे का निपटारा होना अलग बात है, केस का डिसीजन आना अलग बात हैकेस का जजमेंट आना अलग बात है और न्याय मिलना बिलकुल अलग बात है | अब इतनी साफ़  बात जिस मैकोले ने IPC के बारे में लिखी हो उस IPC को भारत की संसद ने 64 साल   बाद भी नहीं बदला है और ना कभी कोशिश ही की है |

Land Acquisition Act - एक अंग्रेज आया इस देश में उसका नाम था डलहौजी    | ब्रिटिश पार्लियामेंट ने उसे एक ही काम के लिए भारत भेजा था कि तुम जाओ और   भारत के किसानों के पास जितनी जमीन है उसे छिनकर अंग्रेजों के हवाले करो |   डलहौजी ने इस "जमीन को हड़पने के कानून" को भारत में लागू करवाया, इस कानून को  लागू कर के किसानों से जमीने छिनी गयी | जो जमीन किसानों की थी वो ईस्ट इंडिया   कंपनी की हो गयी | डलहौजी ने अपनी डायरी में लिखा है कि " मैं गाँव गाँव जाता  था और अदालतें लगवाता था और लोगों से जमीन के कागज मांगता था" | और आप जानते  हैं कि हमारे यहाँ किसी के पास उस समय जमीन के कागज नहीं होते थे क्योंकि ये   हमारे यहाँ परंपरा से चला आ रहा था या आज भी है कि पिता की जमीन या जायदाद बेटे   की हो जाती है, बेटे की जमीन उसके बेटे की हो जाती है | सब जबानी होता था, जबान  की कीमत होती थी या आज भी है आप देखते होंगे कि हमारे यहाँ जो शादियाँ होती हैं
   वो सिर्फ और सिर्फ जबानी समझौते से होती है कोई लिखित समझौता नहीं होता है, एक   दिन /तारीख तय हो जाती है और लड़की और लड़का दोनों पक्ष शादी की तैयारी में लग  जाते है लड़के वाले निर्धारित तिथि को बारात ले के लड़की वालों के यहाँ पहुँच जाते है, शादी हो जाती है | तो कागज तो किसी के पास था नहीं इसलिए सब की जमीनें   उस अत्याचारी डलहौजी ने हड़प ली | एक दिन में पच्चीस-पच्चीस हजार किसानों से  जमीनें छिनी गयी | परिणाम क्या हुआ कि इस देश के करोड़ों किसान भूमिहीन हो गए डलहौजी के आने के पहले इस देश का किसान भूमिहीन नहीं था, एक-एक किसान के पास कम  से कम 10 एकड़ जमीन थी, ये अंग्रेजों के रिकॉर्ड बताते हैं | डलहौजी ने आकर इस   देश के 20 करोड़ किसानों को भूमिहीन बना दिया और वो जमीने अंग्रेजी सरकार की हो
   गयीं | 1947 की आजादी के बाद ये कानून ख़त्म होना चाहिए था लेकिन नहीं, इस देश   में ये कानून आज भी चल रहा है | हम आज भी अपनी खुद की जमीन पर मात्र किरायेदार  हैं, अगर सरकार का मन हुआ कि आपके जमीन से हो के रोड निकाला जाये तो आपको एक  नोटिस दी जाएगी और आपको कुछ पैसा दे के आपकी घर और जमीन ले ली जाएगी | आज भी इस  देश में किसानों की जमीन छिनी जा रही है बस अंतर इतना ही है कि पहले जो काम  अंग्रेज सरकार करती थी वो काम आज भारत सरकार करती है | पहले जमीन छीन कर  अंग्रेजों के अधिकारी अंग्रेज सरकार को वो जमीनें भेंट करते थे, अब भारत सरकार  वो जमीनें छिनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भेंट कर रही है और
Special Economic Zone उन्हीं जमीनों पर बनाये जा रहे हैं और ये जमीन बहुत बेदर्दी से लिए जा रहे
   हैं | भारतीय या बहुराष्ट्रीय कंपनी को कोई जमीन पसंद आ गयी तो सरकार एक नोटिस  देकर वो जमीन किसानों से ले लेती है और वही जमीन वो कंपनी वाले महंगे दाम पर  दूसरों को बेचते हैं | जिसकी जमीन है उसके हाँ या ना का प्रश्न ही नहीं है, जमीन की कीमत और मुआवजा सरकार तय करती है, जमीन वाले नहीं | एक पार्टी की सरकार वहां पर है तो दूसरी पार्टी का नेता वहां पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है और दूसरी पार्टी की सरकार है तो पहले वाला पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है लेकिन  दोनों पार्टियाँ मिल के इस कानून को ख़त्म करने की कवायद नहीं करते और 1894 का ये अंग्रेजों का कानून बिना किसी परेशानी के इस देश में आज भी चल रहा है | इसी देश में नंदीग्राम होते हैं, इसी देश में सिंगुर होते हैं और अब नोएडा हो रहा है | जहाँ लोग नहीं चाहते कि हम हमारी जमीन छोड़े, वहां लाठियां चलती हैं,   गोलियां चलती है | आपको लगता है कि ये देश आजाद हो गया है ? मुझे तो नहीं लगता   |


Indian Citizenship Act - अंग्रेजों ने एक कानून लाया था Indian   Citizenship Act, आप और हम भारत के नागरिक हैं तो कैसे हैं, उसके Terms और Condition अंग्रेज तय कर के गए हैं | अंग्रेजों ने ये कानून इसलिए बनाया था कि   अंग्रेज भी इस देश के नागरिक हो सकें | तो इसलिए इस कानून में ऐसा प्रावधान है  कि कोई व्यक्ति  (पुरुष या महिला) एक खास अवधि तक इस देश में रह ले तो उसे भारत  की नागरिकता मिल सकती है (जैसे बंगलादेशी शरणार्थी) | लेकिन हमने इसमें आज 2011  तक के 64 सालों में रत्ती भर का भी संशोधन नहीं किया | इस कानून के अनुसार कोई   भी विदेशी आकर भारत का नागरिक हो सकता है, नागरिक हो सकता है तो चुनाव लड़ सकता  है, और चुनाव लड़ सकता है तो विधायक और सांसद भी हो सकता है, और विधायक और सांसद बन सकता है तो मंत्री भी बन सकता है, मंत्री बन सकता है तो प्रधानमंत्री  और राष्ट्रपति भी बन सकता है | ये भारत की आजादी का माखौल नहीं तो और क्या है ?
   दुनिया के किसी भी देश में ये व्यवस्था नहीं है | आप अमेरिका जायेंगे और रहना  शुरू करेंगे तो आपको ग्रीन कार्ड मिलेगा लेकिन आप अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं  बन सकते, जब तक आपका जन्म अमेरिका में नहीं हुआ होगा | ऐसा ही कनाडा में हैब्रिटेन में है, फ़्रांस में है, जर्मनी में है | दुनिया में 204 देश हैं लेकिन
   दो-तीन देश को छोड़ के हर देश में ये कानून है कि आप जब तक उस देश में पैदा नहीं   हुए तब तक आप किसी संवैधानिक पद पर नहीं बैठ सकते, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है  | कोई भी विदेशी इस देश की नागरिकता ले सकता है और इस देश के सर्वोच्च  संवैधानिक पद पर आसीन हो सकता है और आप उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि कानून है,    Indian Citizenship Act , उसमे ये व्यवस्था है | ये अंग्रेजों के समय का कानून  है, हम उसी को चला रहे हैं, उसी को ढो रहे हैं आज भी, आजादी के 64 साल बाद भी |   आप समझते हैं कि हमारी एकता और अखंडता सुरक्षित रहेगी ?
Indian Advocates Act - हमारे देश में जो अंग्रेज जज होते थे वो काला   टोपा लगाते थे और उसपर नकली बालों का विग लगाते थे | ये व्यवस्था आजादी के 40-50 साल बाद तक चलता रहा था | हमारे यहाँ वकीलों का जो ड्रेस कोड है वो इसी  कानून के आधार पर है, काला कोट, उजला शर्ट और बो ये हैं वकीलों का ड्रेस कोड |   काला कोट जो होता है वो आप जानते हैं कि गर्मी को सोखता है, और अन्दर की गर्मी   को बाहर नहीं निकलने देता, और इंग्लैंड में चुकी साल में 8-9 महीने भयंकर ठण्ड   पड़ती है तो उन्होंने ऐसा ड्रेस अपनाया, अब हम भारत में भी ऐसा ही ड्रेस पहन रहे  हैं ये समझ से बाहर की बात है | हमारे यहाँ का मौसम गर्म है और साल में नौ महीने तो बहुत गर्मी रहती है और अप्रैल से अगस्त तक तो तापमान 40-50 डिग्री तक  हो जाता है फिर ऐसे ड्रेस को पहनने से क्या फायदा जो शरीर को कष्ट दे, कोई और  रंग भी तो हम चुन सकते थे काला रंग की जगह, लेकिन नहीं | हमारे देश में आजादी  के पहले के जो वकील हुआ करते थे वो ज्यादा हिम्मत वाले थे | लोकमान्य बाल  गंगाधर तिलक हमेशा मराठी पगड़ी पहन कर अदालत में बहस करते थे और गाँधी जी ने कभी  काला कोट नहीं पहना और इसके लिए कई बार उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा था,   लेकिन उन लोगों ने कभी समझौता नहीं किया |


Indian Motor Vehicle Act - उस ज़माने में कार/मोटर जो था वो सिर्फ   अंग्रेजों, रजवाड़ों और पैसे वालों के पास होता था तो इस कानून में प्रावधान डाला गया कि अगर किसी को मोटर से धक्का लगे या धक्के से मौत हो जाये तो सजा   नहीं होनी चाहिए या हो भी तो कम से कम | साल डेढ़ साल की सजा हो ऐसी व्यवस्था  होनी चाहिए उसको हत्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि हत्या में तो धारा 302 लग  जाएगी और वहां हो जाएगी फाँसी या आजीवन कारावास, तो अंग्रेजों ने इस एक्ट में  ये प्रावधान रखा कि अगर कोई (अंग्रेजों के) मोटर के नीचे दब के मरा तो उसे कठोर   और लम्बी सजा ना मिले | ये व्यवस्था आज भी जारी है और इसीलिए मोटर के धक्के से  होने वाली मौत में किसी को सजा नहीं होती | और सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस देश   में हर साल डेढ़ लाख लोग गाड़ियों के धक्के से या उसके नीचे आ के मरते हैं लेकिन  आज तक किसी को फाँसी या आजीवन कारावास नहीं हुआ |


Indian Agricultural Price Commission Act - ये भी अंग्रेजों के ज़माने   का कानून है | पहले ये होता था कि किसान, जो फसल उगाते थे तो उनको ले के मंडियों में बेचने जाते थे और अपने लागत के हिसाब से उसका दाम तय करते थे अंग्रेजों ने हमारे कृषि व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए ये कानून लाया और किसानों को उनके फसल का दाम तय करने का अधिकार समाप्त कर दिया | अंग्रेज अधिकारी मंडियों में जाते थे और वो किसानों के फसल का मूल्य तय करते थे कि आज ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा और ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा, ऐसे ही हर अनाज  का दाम वो तय करते थे | आप हर साल समाचारों में सुनते होंगे कि "सरकार ने गेंहू   का,धान का, खरीफ का, रबी का समर्थन मूल्य तय किया" | ये किसानों के फसलों का  न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है, मतलब किसानों के फसलों का आधिकारिक मूल्य होता  है | इससे ज्यादा आपके फसल का दाम नहीं होगा | किसानों को अपने उपजाए अनाजों का   दाम तय करने का अधिकार आज भी नहीं है इस आजाद भारत में | उनका मूल्य तय करना  सरकार के हाथ में होता है | और आज दिल्ली के AC Room में बैठ कर वो लोग किसानों के फसलों का दाम तय करते हैं जिन्होंने खेतों में कभी पसीना नहीं बहाया और जो खेतों में पसीना बहाते हैं, वो अपने उत्पाद का दाम नहीं तय कर सकते |
Indian Patent Act - अंग्रेजों ने एक कानून लाया Patent Act , और वो   बना था 1911 | Patent मतलब होता है एक तरह का Legal Right, कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक या कंपनी अगर किसी चीज का आविष्कार करती है तो उसे उस आविष्कार पर एक  खास अवधि के लिए अधिकार दिया जाता है | ये जा के 1970 में ख़त्म हुआ श्रीमती    इंदिरा गाँधी के प्रयासों से लेकिन इसे अब फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के  दबाव में बदल दिया गया है | अभी विस्तार से नहीं लिखूंगा मतलब इस देश के लोगों    के हित से ज्यादा जरूरी है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित |
  
ये हैं भारत के विचित्र कानून, सब पर लिखना संभव नहीं है और ज्यादा बोझिल न हो जाये इसलिए यहीं विराम देता हूँ | इन कानूनों के किताब बाज़ार में उपलब्ध हैं लेकिन मैंने इनके इतिहास को वर्तमान के साथ जोड़ के आपके सामने प्रस्तुत किया है, और इन कानूनों का इतिहास, उन पर हुई चर्चा को ब्रिटेन के संसद House of Commons की library से लिया गया हैं

साभार: राजीव भाई के व्याख्यान 


मंगलवार, 19 मार्च 2013

ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते २१वी सदी के भारत के कर्णधार(CHILD LABOUR)


शिक्षा लेने की उम्र में भीख मांगने की मजबूरी



रोज घर से कार्यालय जाते समय दिल्ली के नारायण फ्लाईओवर के पास ५-७ मिनट का ट्रैफिक जाम सामान्य सी बात है..मगर एक और घटना रोज घटती है जिसे हमने रोज लगते ट्रैफिक   जाम की तरह स्वीकार कर लिया है..वो है,इन्ही सिगनलों पर भीख मांगते कुछ अवयस्क बच्चे..मेरी भी दिनचर्या में कुछ ऐसा ही था,एक आँखों ही आँखों में अनकहा सा रिश्ता बन गया था इन बच्चो से,रोज मेरी कार वहां रूकती, कुछ जाने पहचाने चेहरों में से एक चेहरा मेरी ओर आता और मैं वहां के कई लोगो की तरह पहले से ही निकाल के रक्खे गए कुछ सिक्कों में से १ या २ उन्हें देकर दानवीर बनने की छद्म आत्मसंतुष्टि लिए आगे बढ़ जाता..

व्यस्तता के कारण कई दिन बाद कार्यालय जाना हुआ ..मगर आज एक नए चेहरे ने उसी जगह आ के हाथ फैला दिया रोज की तरह मैंने गाड़ी शीशे निचे करते हुए १ रूपये का एक सिक्का उसकी और बढ़ा दिया मगर नए चेहरे को देखकर अनायास ही निकाल पड़ा "नया आया है क्या?"बच्चा मेरी और देखता हुआ बिना कोई जबाब दिए सिक्का लेकर आगे बढ़ गया...

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

राईट बन्धुओं से पहले ही भारत में विमान का आविष्कार हो चुका था !


 राईट बन्धुओं से पहले ही भारत में विमान का आविष्कार हो चुका था !

हिन्दू धर्म से संबंधित विभिन्न धार्मिक कथा कहानियों में इस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं कि प्राचीन काल में विभिन्न देवी-देवता,यक्ष,गंधर्व,ऋषि-मुनि इत्यादि विभिन्न प्रकार के विमानों द्वारा यात्रा भ्रमण किया करते थे। जैसे कि रामायण में पुष्पक विमान का वर्णन आता है। महाभारत में भी श्री कृष्ण, जरासंध आदि के विमानों का वर्णन आता है। इसी प्रकार से श्रीमहाभागवत में कर्दम ऋषि की एक कथा आती है कि तपस्या में तल्लीनता के कारण वे अपनी पत्नी की ओर अधिक ध्यान नहीं दे पाते थे। किन्तु कुछ समय बाद जब उन्हे इसका भान हुआ तो उन्होंने अपने विमान के द्वारा उसे संपूर्ण विश्व का भ्रमण कराया।

देखा जाए तो इन उपरोक्त वर्णित कथाओं को जब आज का तार्किक व प्रयोगशील व्यक्ति सुनता,पढ़ता है तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से ये विचार आता है कि यें सब कपोल कल्पनाएं हैं, मानव के मनोंरंजन हेतु गढ़ी गई कहानियॉ मात्र है। ऐसा विचार आना सहज व स्वाभाविक है, क्योंकि आज देश में इस प्रकार के कहीं कोई प्राचीन अवशेष नहीं मिलते, जों ये सिद्ध कर सकें कि प्राचीनकाल में मनुष्य विमान निर्माण की तकनीक से परिचित था। किन्तु यदि भारतीय ग्रन्थों का सही तरीके से अध्ययन, मनन करें तो ये स्पष्ट हो जाता है कि युद्ध कौशल में प्रयोग होने वाले विभिन्न प्रक्षेपात्रों, अदृ्श्य अस्त्रों-शस्त्रों आदि की उपलब्धता भारत में विज्ञान के चर्मोत्कर्ष की ओर संकेत करती है। इसी क्रम में प्राचीन भारतीय विमान शास्त्र पर आज ये लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ जिससे कि आप लोगों को प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की एक झलकी मिल सके।  

मैं यह दृ्डतापूर्वक कह सकता हूँ कि विभिन्न वैज्ञानिक निर्माण, आविष्कार आदि जितनी भी लोकोपयोगी विद्याएं हैं---ये सभी भारत की ही देन हैं। समुद्रतल तथा आकाशमंडल की परिधि में उडना, विभिन्न लोकों में गमन, विशाल भवन,यान, वाहन आदि का बनाना इत्यादि सम्पूर्ण यान्त्रिक संस्कृ्ति, आविष्कारों, खोजों की आदि विकासस्थली हमारी यह भारतभूमी ही है। व्यास,वशिष्ठ,विश्वामित्र,पाराशर, याज्ञवल्क्य, जैमिनी, अत्रि, वत्स, नारद, भारद्वाज, शकटायन, स्फोटायन, प्रभूति इत्यादि मन्त्रदृ्ष्टा ऋषि ही यन्त्रों के भी आविष्कारक तथा निर्माता रहे हैं । महर्षि अत्रि और वत्स तो अपने समय के तत्वान्वेषी वैज्ञानिक मनीषी थे तथा सर्वप्रथम इन्ही दो मनीषियों नें चन्द्र सूर्य ग्रहण विज्ञान और आकर्षण विज्ञान का पता लगाया था। जिसका विशद विवेचन यहाँ तो असंभव है। खेद है कि आज अपने इस गौरवपूर्ण अध्यायों से हम अपरिचित होकर उक्त तथ्यों के आविष्कार का श्रेय पश्चिमी जगत को देते हैं।  ओर जो थोडे बहुत कुछ बहुत लोग इन तथ्यों से परिचित हैं भी, वो भी अपनी अकर्मण्यता से इन अमूल्य तथ्यों को विश्व के प्रबुद्ध समाज के सामने लाने का कोई प्रयास नहीं करते।  लेकिन अगर कोई भला आदमी प्रयास करता भी है तो ये हिन्दूस्तान में बैठे पश्चिमबुद्धि काले अंग्रेज जो बैठे हैं, बिना जाने समझे इन तथ्यों को नकारने में। सबसे पहले तो इन तथाकथित विज्ञानबुद्धियों से ही निपटने में बेचारे का हौंसला पस्त हो चुका होता है--- शेष दुनिया को कोई क्या खाक समझाएगा।
यह निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन भारतीय ऋषि महर्षियों नें केवल धर्मव्यवस्था, दर्शन, ज्योतिष तथा कर्मकांड में ही नहीं बल्कि स्थापत्य कला, चिकित्साविज्ञान, खगोलविज्ञान, यन्त्रनिर्माण इत्यादि वैज्ञानिक क्षेत्र में भी विश्व का सफल नेतृ्त्व किया था।
महर्षि भारद्वाज प्रणीत "यन्त्र सर्वस्व" नामक ग्रन्थ मननीय है। 
उक्त ग्रन्थ के वैमानिक प्रकरण में सामरिक एवं नागरिक दोनों प्रकार के विमानों के निर्माण का इतिहास  यन्त्र, उपयन्त्र, शत्रु के साथ युद्ध करने की विधि, अपने निर्माण की रक्षा, शत्रु के ऊपर धुँआ छोडना, उनको डराने के लिए भीषण आवाज करना, आग्नेयास्त्रों का प्रयोग करना इत्यादि विभिन्न विषयों का सांगोपांग वर्णन है। महर्षि भारद्वाज के शब्दों में पक्षियों की भान्ती उडने के कारण वायुयान को विमान कहते हैं। वेगसाम्याद विमानोण्डजानामिति ।।
विमानों के प्रकार:- शकत्युदगमविमान अर्थात विद्युत से चलने वाला विमान, धूम्रयान(धुँआ,वाष्प आदि से चलने वाला), अशुवाहविमान(सूर्य किरणों से चलने वाला), शिखोदभगविमान(पारे से चलने वाला), तारामुखविमान(चुम्बक शक्ति से चलने वाला), मरूत्सखविमान(गैस इत्यादि से चलने वाला), भूतवाहविमान(जल,अग्नि तथा वायु से चलने वाला)।
इतना ही नहीं इसी वैमानिक प्रकरण के "अहाराधिकरण" नामक खण्ड में विमानयात्रियों एवं चालकों के आहार अर्थात भोजन व्यवस्था का पूर्ण विवेचन किया गया है। उक्त आहाराधिकरण का पहला सूत्र है "आहार कल्पभेदात"  अर्थात वायुयान यात्रियों को आशानकल्प नामक कहे ग्रन्थ में कहे गए अनुसार ही भोजन व्यवस्था करनी चाहिए। यहाँ जिस आशानकल्प नामक ग्रन्थ का जिक्र किया गया है, दुर्भाग्य से वो ग्रन्थ आज लुप्त हो गया है। लेकिन जब महर्षि भारद्वाज नें अपने ग्रन्थ में इसका जिक्र किया है तो इतनी बात तो अवश्य स्पष्ट हो जाती है कि वो ग्रन्थ उनसे भी पूर्वकालीक तथा अत्यन्त प्राचीन है और साथ ही प्रमाणिक एवं शिष्ट सम्मत भी।
आगे महर्षि लिखते हैं कि विमान में भोजन व्यवस्था सर्वदा समयानुसार होनी चाहिए साथ ही भोजन को आकाश के दूषित वातावरण एवं विमान के विषैले गैस के प्रभाव से भी बचाना चाहिए।  यदि विमान में किसी कारणवश  स्थूल भोजन न मिले या असुविधा हो अथवा अरूचिकर हो तो हल्का एवं सूखा भोजन भी ग्रहण किया जा सकता है। रूचि के अनुसार कन्दमूल फल इत्यादि भी ग्राह्य हैं ।
महर्षि अगस्तय कृ्त "अगस्त्यविमानसंहिता" मे भी यह सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि जिस प्रकार जल में नौकाएं तैरती हैं, उसी प्रकार अन्तरिक्ष में वायुभार आदि के सन्तुलन से जो यान गमनागमन करे ---वह विमान है। जले नौकेव यदयान विमान व्योम्नि कीर्तीतम ।।

खैर ये तो बात हुई अति प्राचीन काल की लेकिन यदि मैं आप लोगों से ये कहूँ कि इसी आधुनिक युग में जब 17 दिसंबर सन 1903 में राईट बन्धुओं द्वारा विमान का आविष्कार किया गया तो उससे 8 वर्ष पूर्व ही भारत में विमान का आविष्कार हो चुका था तो शायद आप लोग विश्वास नहीं करेंगें। आप में से कुछ लोग इसे शायद निरा झूठ या "गप्प" भी कह दें तो कोई अतिश्योक्ति न होगी । लेकिन ये बिल्कुल सच है । जी हाँ, सन 1895 में भारतवर्ष में मुम्बई के चौपाटी बीच पर पंडित श्री शिवकर बापू तलपदे जी(जो कि आजीवन भारतीय पद्धति से विमान निर्माण में लगे रहे) ने सम्पूर्ण भारतीय तकनीक से निर्मित " मरूत्सखा" नामक विमान बनाकर उसे 18 फिट ऊपर आकाश में उडाया भी था । महाराज सयाजीराव गायकवाड तथा श्रीरानाडे आदि विशिष्ट व्यक्तियों के समक्ष सम्पन इस कार्यक्रम का सम्पूर्ण सचित्र विवरण तात्कालिक केशरी न.भा.टा. तथा धर्मयुग के प्रथम अंक में प्रकाशित हुआ था । महाराजा बदौडा ने इस को आगे बढाने के लिए आर्थिक सहायता की भी घोषणा की थी...लेकिन ब्रिटिश सरकार के चलते यह संभव नहीं हो पाया। बाद में ब्रिटेन की "रेले" नाम की एक कम्पनी नें उस विमान का  ढाँचा मय सभी अधिकार खरीद लिए । 

अन्त में मैं आप लोगों से जानना चाहूँगा कि क्या उपरोक्त विवरण आपको ये विश्वास नहीं दिलाता कि प्राचीन काल में विमान विद्या कपोल कल्पना न होकर एक यथार्थ था। बेशक कुछ लोग मरते दम तक भारतीय ज्ञान-विज्ञान की सर्वोच्चता  को अस्वीकार कर इन्हे कपोल कल्पना ही मानते रहें,लेकिन वास्तविकता तो ये है कि   ये सच है ओर ऎसे ही न जाने कितने अगिणित विश्वासों को सार्थक करने एवं अपनी सत्यता की सिद्धी हेतु हमारे सैंकडों हजारों ग्रन्थ आज भी सत्यन्वेषियों की राह देख रहे हैं।


विमानशास्त्रसे कुछ चित्र आपके लिए -

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

राम मंदिर के बाद रामसेतु -- हिन्दू आस्था पर कांग्रेस का इस्लामिक प्रहार (ram setu)




कांग्रेस  सरकार  अब नीचता और हिन्दू विरोध की  पराकाष्ठा  करते हुए  रामसेतु को तोड़ने के कार्य में युद्ध स्तर पर लग गयी है ..शायद चुनावों से पहले मज़बूरी में अफजल को दी गयी  फांसी का असर कम करने के लिए और मुसलमान वोटो की लालसा में रामसेतु को तोड़ने का कार्यक्रम बनाया जा रहा है ..इसी  कड़ी के अंतर्गत सरकार ने आरके पचौरी समिति की सिफारिशों को नकार दिया है।ये वही सरकार है जिसके मंत्री लाख करोड़ रूपये का एक घोटाला करते हैं और अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर लाखो करोड़ जेहादियों को असलहा और बम खरीदने के लिए बाट देती है॥ कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा दे कर तर्क दिया है की

भारत की सरकार (कांग्रेस) किसी राम के अस्तित्व को नहीं मानती है अतः रामसेतु की बात निरर्थक है ॥जब कांग्रेस सरकार राम को नहीं मानती तो रामसेतु को कैसे मानेगी??

सरकार का दूसरा तर्क है की लगभग 800 करोड रुपए वो खर्च कर चुकी है अतः इस परियोजना को बंद नहीं किया जा सकता॥

पहले तर्क के बारे मे कांग्रेस के हलफनामे के मुताबिक केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पचौरी के नेतृत्व वाली समिति की रिपोर्ट पर विचार किया और उसकी सिफरिशों को नामंजूर कर दिया। सरकार ने सुनवाई के दौरान रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने पर कोई कदम उठाने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस पर फैसला करने को कहा था। सरकार ने कहा कि 2008 में दायर अपने पहले हलफनामे पर कायम है जिसे राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने मंजूरी दी थी। इससे पहले अप्रैल में केन्द्र सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि वह रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने में असमर्थ है।सरकार आतंकवादी अफजल के चश्मे और घड़ी को जेहादियों को देने की बात कर सकती है जिसे वो देशद्रोही संग्रहालय बनाये मगर उसे 100 करोड हिंदुस्थानियों की आस्था के प्रतीक रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने में दौरे आने लगते हैं ॥अब हिंदुओं को सोचना होगा की क्या सचमुच द्रोही कांग्रेसियों को अपने घर मे जगह देनी चाहिए जो "राम" जैसे पूज्य के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते हैं॥ क्या ये संभव है कांग्रेस का कोई भी देशद्रोही धर्मद्रोही सदस्य “दिग्विजय सिंह के इष्टदेव मुहम्मद साहब”  या अपनी “इटालियन मम्मी” के आस्था के प्रतीक "जीसस" के अस्तित्व पर प्रश्न उठाए ??
अंग्रेज़ो ने सर्वप्रथम हिंदुस्तान पर राज करने के लिए हिंदुस्थानी जनमानस के स्वाभिमान पर चोट की और उसे खतम किया जब व्यक्ति का स्वाभिमान मर जाए तो उसे एक जानवर जैसे रखकर ,पालकर ,प्रताड़ित करके जैसे चाहे वैसे कार्य लिया जा सकता है। इसी क्रम मे अंग्रेज़ो ने बेगार और सार्वजनिक कोड़े लगाने का कुकृत्य शुरू किया।  यही काम हिंदुओं के साथ कांग्रेस कर रही है हिंदुओं की आस्था का हर वो प्रतीक जो जरा भी स्वाभिमान उनमे पैदा करता हो उसे नष्ट करो ॥ अमरनाथ यात्रा का क्या हाल हुआ हम सब देख रहे हैं॥ रामलला रहेंगे तम्बू और बारिश मे और रामसेतु तोड़ा जाएगा। अगर कांग्रेस सरकार मे सचमुच इतना पौरुष बचा है तो क्यूँ नहीं जिस "राम" को काल्पनिक कहते हैं उसकी मूर्तियाँ अयोध्या से हटवा देते हैंहैदराबाद मे मंदिरों मे घंटिया बजाए जाने पर प्रतिबंध भी हिन्दू स्वाभिमान को तोड़ने की कांग्रेस की एक कुटिल चाल है ॥हालांकि बिना सेतु को तोड़े भी वैकल्पिक तरीके से सेतु बनाया जा सकता है मगर कांग्रेस सेतु तोड़ने पर अडिग है क्यूकी सेतु के साथ साथ टूटेगा हिंदुओं का स्वाभिमान ,सेतु के टूटने के साथ कांग्रेस प्रहार करेगी लाखो वर्ष से हिंदुस्थान मे राम को भगवान मानने की आस्था परऔर सेतु के साथ टूटेगा साढ़े सोलह लाख वर्षों से भगवान राम की एक अमर धरोहर जो उस काल मे हमारी सिविल इंजीनियरिंग का अदभूत नमूना है । 

अब यदि कांग्रेस सरकार के दूसरे तर्क 850 करोड रुपए को ले तो क्या लाखों करोडो का घोटाला करने वाले कांग्रेसियों को लाखो साल पुराने हिन्दू स्मृति चिन्ह के लिए टैक्स के 850 करोड भी नहीं मिल रहे हैं और वो पैसे भी हमारे टैक्स के हैं ,हम हिंदुओं की मेहनत के ॥अब यदि कांग्रेस सरकार के दूसरे तर्क 850 करोड रुपए को ले तो क्या लाखों करोडो का घोटाला करने वाले कांग्रेसियों को लाखो साल पुराने हिन्दू स्मृति चिन्ह के लिए टैक्स के 850 करोड भी नहीं मिल रहे हैं और वो पैसे भी हमारे टैक्स के हैं ,हम हिंदुओं की मेहनत के ॥ अगर पैसे की बात है तो कल से दिग्विजय और राहुल गांधी कटोरा ले के खड़े हो जाएँ तो हिंदुस्तान के 100 करोड हिन्दू राम सेतु के लिए 100 रुपए भी देंगे तो रामसेतु का आर्थिक भार सरकार से खतम हो जाएगा और हिन्दू धर्म विरोधी कांग्रेसियों के लिए बख्सीश भी बच जाएगी.

सभी हिन्दू भाइयों को इस विषय पर गंभीरता पूर्वक सोचना होगा की आखिर कांग्रेस की ये साजिश क्या है 
रोमकन्या सोनिया और कांग्रेसियों ने वेटिकन सीटी के आदेश मुस्लिम आतंकवाद पर आंखे मूँद ली  है इससे मुसलमान हिंदुओं को कमजोर करेंगे और अंततः पूर्वोत्तर की तरह हिंदुस्थान को एक ईसाई बहुल राज्य बनाया जाएगा॥
इसी क्रम मे कश्मीर 
,उत्तरप्रदेश,हैदराबाद,बिहार,पश्चिम बंगालऔर आसाम मे हुए हिंदुओं के नरसंहार एवं हिन्दू माताओं बहनो का शील भंग करना आता है । मुसलमानो को आर्थिक एवं राजनीतिक संरक्षण दे कर हिन्दू और हिन्दू अस्मिता को नष्ट करना कांग्रेस सरकार के प्रायोजित कार्यक्रम का प्रथम चरण है॥ अगले चरण मे धीरे धीरे ईसाई मशीनरियों द्वारा भारत का ईसाईकरण. दुखद ये है की कुछ हिन्दू धर्म के द्रोही सेकुलर लोग कांग्रेस के साथ इस साजिश मे शामिल हो गए हैं और कुछ हिन्दू कांग्रेस की इस साजिश को समझ नहीं पा  रहे हैं॥
अब यदि रामसेतु का आर्थिक पक्ष देखें तो ये कांग्रेस की दलाली खाने की एक और चाल है इसकी शुरुआत तब होती हैजब पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जोर्ज बुश भारत आये थे और एक सिविल न्यूक्लीयर डील पर हस्ताक्षर किये गए जिसके अनुसार अमरीका भारत को युरेनियम-235 देने की बात कही उस समय पूरी मीडिया ने मनमोहन सिंह की तारीफों  के पुल बांधे और इस डील को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बतायापर पीछे की कहानी छुपा ली गयी l  आप ही बताइए जो अमरीका 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाता है वो भारत पर इतना उदार कैसे हो गया की सबसे कीमती रेडियोएक्टिव पदार्थ  जिससे परमाणु हथियार बनाये जा सकते हैं,एकाएक भारत को बेचने के लिए तैयार हो गया दरअसल इसके पीछे की कहानी यह है की इस युरेनियम-235 के बदले मनमोहन सिंह ने यह पूरा थोरियम भण्डार अमरीका को बेच दिया जिसका मूल्य अमरीका द्वारा दिए गए  युरेनियम से लाखो गुना ज्यादा है आपको याद होगा की इस डील के लिए मनमोहन सिंह ने UPA-1 सरकार को दांव पर लगा दिया थाफिर संसद में वोटिंग के समय सांसदों को खरीद कर अपनी सरकार बचायी थी यह उसी कड़ी का एक हिस्सा है l  थोरियम का भण्डार भारत में उसी जगह पर है जिसे हम रामसेतु’ कहते हैंयह रामसेतु भगवान राम ने लाखों वर्ष पूर्व बनाया थाक्योंकि यह मामला हिन्दुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा था इसलिए मनमोहन सरकार ने इसे तोड़ने के बड़े बहाने  बनाये। जिसमें से एक बहाना यह था की रामसेतु तोड़ने से भारत की समय और धन की बचत होगीजबकि यह नहीं बताया गया की इससे भारत को लाखों करोड़ की चपत लगेगी क्योंकि उसमें मनमोहन सिंहकांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टी डीएमके का  निजी स्वार्थ था l  भारत अमरीका के बीच डील ये हुई थी की रामसेतु तोड़कर उसमें से थोरियम निकालकर अमरीका भिजवाना था तथा जिस कंपनी को यह थोरियम निकालने का ठेका दिया जाना था वो डीएमके के सदस्य टी आर बालू की थी। अभी यह मामला सुप्रीमकोर्ट में लंबित है l  इस डील को अंजाम देने के लिए मनमोहन (कांग्रेस) सरकार भगवान राम का अस्तित्व नकारने का पूरा प्रयास कर रही हैओने शपथपत्रों में रामायण को काल्पनिक और भगवान राम को मात्र एक पात्र’ बताती है और सरकार की कोशिश है की ये जल्द से  जल्द टूट जायेजबकि अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा ने रामसेतु की पुष्टि अपनी रिपोर्ट में की है l  अतः यह जान लीजिये की अमरीका कोई मूर्ख नहीं है जिसे एकाएक भारत को समृद्ध बनाने की धुन सवार हो गयी हैयदि अमरीका 10 रुपये की चीज़ किसी को देगा तो  उससे 100 रुपये का फायदा लेगाऔर इस काम को करने के लिए उन्होंने अपना दलाल भारत में बिठाया हुआ है जिसका नाम है "मनमोहन सिंह" l  अब केवल कैग रिपोर्ट का इंतज़ार हैजो कुछ दिनों में इस घोटाले की पुष्टि कर  देगी…. यदि 1.86 लाख करोड़ का कोयला घोटाला महाघोटाला है तो 48 लाख करोड़ के घोटाले को क्या कहेंगे आप ही बताइए।
हम सभी हिन्दू भाइयों को इस बात को समझना होगा की यदि आज राम सेतु तोड़ा गया तो ये सिर्फ एक ऐतिहासिक संरचना को तोड़ना नहीं होगा बल्कि हिंदुओं के धार्मिक आस्था पर चोट होगी॥ कहते हैं की इतिहास स्वयं को दोहराता है रामसेतु को तोड़ना ठीक उसी प्रकार है जैसे बाबर ने रामलला के मंदिर को तोड़ा था अंतर सिर्फ इतना ही है की इस बार बाबर के रूप मे “सोनिया’,”राहुल”,”दिग्विजय” और “चिदम्बरम” जैसे कांग्रेसियों की फौज है और राम मंदिर की जगह है रामसेतु......

"आशुतोष नाथ तिवारी"

स्रोत: APJकलाम साहब का इंटरव्यू,कांग्रेस का हलफनामा,अंतर्जाल सूचनाएँ ,गूगल ब्लाग्स

being hindu









बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

पीलिया का कारण एवं प्राकृतिक उपचार


पीलिया का  कारण:
वायरल हैपेटाइटिस या जोन्डिस को साधारण लोग पीलिया के नाम से जानते हैं। यह रोग बहुत ही सूक्ष्‍म विषाणु(वाइरस) से होता है। शुरू में जब रोग धीमी गति से व मामूली होता है तब इसके लक्षण दिखाई नहीं पडते हैं
, परन्‍तु जब यह उग्र रूप धारण कर लेता है तो रोगी की आंखे व नाखून पीले दिखाई देने लगते हैं, लोग इसे पीलिया कहते हैं।  जिन वाइरस से यह होता है उसके आधार पर मुख्‍यतः पीलिया तीन प्रकार का होता है वायरल हैपेटाइटिस ए, वायरल हैपेटाइटिस बी तथा वायरल हैपेटाइटिस नान ए व नान बी।  रोग का प्रसार कैसेयह रोग ज्‍यादातर ऐसे स्‍थानो पर होता है जहॉं के लोग व्‍यक्तिगत व वातावरणीय सफाई पर कम ध्‍यान देते हैं अथवा बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देते। भीड-भाड वाले इलाकों में भी यह ज्‍यादा होता है। वायरल हैपटाइटिस बी किसी भी मौसम में हो सकता है। वायरल हैपटाइटिस ए तथा नाए व नान बी एक व्‍यक्ति से दूसरे व्‍यक्ति के नजदीकी सम्‍पर्क से होता है। ये वायरस रोगी के मल में होतें है पीलिया रोग से पीडित व्‍यक्ति के मल सेदूषित जलदूध अथवा भोजन द्वारा इसका प्रसार होता है।  ऐसा हो सकता है कि कुछ रोगियों की आंख, नाखून या शरीर आदि पीले नही दिख रहे हों परन्‍तु यदि वे इस रोग से ग्रस्‍त हो  तो अन्‍य रोगियो की तरह ही रोग को फैला सकते हैं।  वायरल हैपटाइटिस बी खून व खून व खून से निर्मित प्रदार्थो के आदान प्रदान एवं यौन क्रिया द्वारा फैलता है। इसमें वह व्‍यक्ति हो देता है उसे भी रोगी बना देता है। यहॉं खून देने वाला रोगी व्‍यक्ति रोग वाहक बन जाता है। बिना उबाली सुई और सिरेंज से इन्‍जेक्‍शन लगाने पर भी यह रोग फैल सकता है।  पीलिया रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्ति वायरस, निरोग मनुष्‍य के शरीर में प्रत्‍यक्ष रूप से अंगुलियों से और अप्रत्‍यक्ष रूप से रोगी के मल से या मक्खियों द्वारा पहूंच जाते हैं। इससे स्‍वस्‍थ्‍य मनुष्‍य भी रोग ग्रस्‍त हो जाता है।
पीलिया का प्राकृतिक उपचार
  1. पीलिया के रोगियों को ऐसा भोजन करना चाहिए जो कि आसानी से पच जाए जैसे खिचड़ी, दलिया, फल, सब्जियां आदि।
  2. पीलिया के रोगियों को मैदा, मिठाइयां, तले हुए पदार्थ, अधिक मिर्च मसाले, उड़द की दाल, खोया, मिठाइयां नहीं खाना चाहिए।
  3. रोगी को दिन में तीन बार एक एक प्लेट पपीता खिलाना चाहिए।
  4. नीम के पत्तों को धोकर इनका रस निकाले। रोगी को दिन में दो बार एक बड़ा चम्मच पिलाएँ। इससे पीलिया में बहुत सुधार आएगा।
  5. पीलिया के रोगी को लहसुन की पांच कलियाँ एक गिलास दूध में उबालकर दूध पीना चाहिए , लहसुन की कलियाँ भी खा लें। इससे बहुत लाभ मिलेगा।
  6. टमाटर पीलिया के रोगी के बहुत लाभदायक होता है। एक गिलास टमाटर के जूस में चुटकी भर काली मिर्च और नमक मिलाएं। यह जूस सुबह के समय लें। पीलिया को ठीक करने का यह एक अच्छा घरेलू उपचार है।
  7. इस रोग से पीड़ित रोगियों को नींबू बहुत फायदा पहुंचाता है। रोगी को 20 ml नींबू का रस पानी के साथ दिन में 2 से तीन बार लेना चाहिए। 
  8. एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच पिसा हुआ त्रिफला रात भर के लिए भिगोकर रख दें। सुबह इस पानी को छान कर पी जाएँ। ऐसा 12 दिनों तक करें।
आधा कप सफेद प्‍याज के रस में गुड़ और पिसी हल्‍दी मिला कर प्रात: वह शाम को पीने से पीलिया में लाभ होता है। छोटे प्‍याज को छील कर चौकोर काट कर सिरके या नींबू के रस में भिगो दें, ऊपर से नमक काली मिर्च डाल दें। पीलिया का यह शर्तियां इलाज है।

तोरई को धीमी आग में भूनें और फिर इसका भुरता बना लें। इसका रस निचोड़कर, थोड़ी मिश्री मिलाकर पिएं। यह पीलिया में अत्यंत लाभदायक होती है।

स्रोत: आयुर्वेदिक पुस्तके एवं अंतर्जाल पृष्ठ


बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

वैलेंटाइन डे(valentine day): प्रेम का पर्व या संस्कारों का अवमूल्यन :

वर्तमान महानगरीय परिवेश में पश्चिम का अन्धानुकरण करने की जो यात्रा शुरू हुई है उसका एक पड़ाव फ़रवरी महीने की १४ तारीख है,हालाँकि प्रेम की अभिव्यक्ति किसी भी प्रकार की हो सकती हैमाँ-बाप,बेटा,भाई,बहन किसी के लिए मगर ये त्यौहार वर्तमान परिवेश में प्रेमी प्रेमिकाओं के त्यौहार के रूप में स्थापित किया गया हैआज कल के युवा या यूँ कह ले आज कल कूल ड्यूड्स बड़े जोर शोर से इस त्यौहार को मना कर आजादी के बाद भीअपनी बौधिक और मानसिक गुलामी का परिचय देते मिल जायेंगे Iपिछले १५-२० वर्षों में इस त्यौहार ने भारतीय परिवेश में अपनी जड़े जमाना प्रारम्भ किया और अब इस त्यौहार के विष बेल की आड़ में हमारी युवा पीढ़ी में बचे खुचे हुए भारतीय संस्कारो का अवमूल्यन किया जा रहा हैइस त्यौहार के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है में उनका जिक्र करके उनका विरोध या महिमामंडन कुछ भी नहीं करना चाहूँगा क्यूकी भारतीय परिवेश में ये पूर्णतः निरर्थक विषय हैI

मेरे मन में एक बड़ा सामान्य सा प्रश्न उठता है की प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए हम एक खास दिन ही क्यों चुने??जहाँ तक प्रेम के प्रदर्शन की बात है हमारे धर्म में प्रेम की अभिव्यक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है मीरा और राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम I मगर महिमामंडन वैलेंटाइन डे का?कई बुद्धिजीवी(या यूँ कह ले अंग्रेजों के बौधिक गुलाम) अक्सर ये कुतर्क करते दिखते हैं की इसे आप प्रेमी प्रेमिका के त्यौहार तक सीमित न करेमेरी बेटी मुझे वैलेंटाइन की शुभकामनायें देती है,और पश्चिम में फादर डे,मदर डे भी मनाया जाता है I मेरा ऐसे बौधिक गुलाम लोगो से प्रश्न है की,अगर पश्चिम में मानसिक और बौधिक रूप से इतना प्रेम भरा पड़ा है कीवहां से प्रेम का त्यौहारहमे उस धरती पर आयात करना पड़ रहा है जहाँ निष्काम प्रेम में सर्वस्व समर्पण की प्रतिमूर्ति मीराबाई पैदा हुईतो पश्चिम में ओल्ड एज होम सबसे ज्यादा क्यों हैं?? क्यों पश्चिम  का निष्कपट प्रेम वहां होने वाले विवाह के रिश्तों को कुछ सालो से ज्यादा आगे नहीं चला पाता.उस प्रेम की मर्यादा और शक्ति तब कहा होती  है ,जब तक बच्चा अपना होश संभालता है ,तब तक उसके माता पिता कई बार बदल चुके होते हैं और जवानी से पहले ही वो प्रेम से परे एकाकी जीवन व्यतीत करता है I ये कुछ विचारणीय प्रश्न है उन लोगो के लिए जो पाश्चात्य सभ्यता की गुलामी में अपनी सर्वोच्चता का अनुभव करते हैं I
ये कैसी प्रेम की अनुभूति है जब पिता पुत्र  से कहता है की तुम्हारा कार्ड मिला थैंक्यू सो मच..और फिर वो एक दूसरे से सालो तक मिलने की जरुरत नहीं समझते I ये कौन से प्रेम की अभिव्यक्ति है जब प्रेमी प्रेमिका विवाह के समय अपने तलाक की तारीख भी निश्चित कर लेते हैं,और यही विचारधारा हम वैलेंटाइन डे:फादर डे मदर डे के रूप में आयात करके अपने कर्णधारो को दे रहे हैंI
मैं किसी धर्म या स्थान विशेष की मान्यताओं के खिलाफ नहीं कह रहा मगर  मान्यताएं वही होती है जो सामाजिक परिवेश में संयोज्य हो I आप इस वैलेंटाइन वाले प्रेम की अभिव्यक्ति सायंकाल किसी भी महानगर के पार्क में एकांत की जगहों पर देख सकते हैंI
क्या ये वासनामुक्त निश्चल प्रेम की अभिव्यक्ति है?? या ये वासना की अभिव्यक्ति हमारे परिवेश में संयोज्य हैशायद नहीं,तो इस त्यौहार का इतना महिमामंडन क्यों?? मेरे विचार से भारतीय परिवेश में प्रेम की प्रथम सीढ़ी वासना को बनाने में इस त्यौहार का भी एक योगदान होता जा रहा है I आंकड़े बताते हैं की वैलेंटाइन डे के दिन परिवार नियोजन के साधनों जैसे गर्भ निरोधक गोलियां,कंडोम आदि की की बिक्री बढ़ जाती हैक्या इसी वीभत्स कामुक नग्न प्रदर्शन को आप वैलेंटाइन मनाने वाले बुद्धिजीवी प्रेम कहते हैं
इस अभिव्यक्ति में बाजारीकरण का भी बहुत हद तक योगदान है कुछ वर्षो तक १-२ दिन पहले शुरू होने वाली भेडचाल वैलेंटाइन वीक से होते हुए वैलेंटाइन मंथ तक पहुच गयी है. मतलब साफ़ है इस नग्न नाच के नाम पर उल जलूल  उत्पादों को भारतीय बाज़ार में भेजनाIटेड्डी बियरग्रीटिंग कार्ड से होते हुए,भारत में वैलेंटाइन का पवित्र प्यार कहाँ तक पहुच गया है नीचे एक विज्ञापन से आप समझ सकते हैं?? 


वस्तुतः ये वैलेंटाइन डे प्रेम की अभिव्यक्ति का दिन न होकर हमारे परिवेश में बाजारीकरण और अतृप्त लैंगिक इच्छाओं की पाशविक पूर्ति का एक त्यौहार बन गया है,जिसे महिमामंडित करके गांवों के स्वाभिमानी भारत को पश्चिम के  गुलामो  का इंडिया बनाने का कुत्षित प्रयास चल रहा हैIउमीद है की युवा पीढ़ी वैलेंटाइन डे के इतिहास में उलझने की बजाय गुलाम भारत के आजाद भारतीय विवेकानंद के इतिहास को देखेगी,जिन्होंने पश्चिम के आधिपत्य के दिनों में भी अपनी संस्कृति और धर्म का ध्वजारोहण शिकागो में कियाI