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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

नोबल का मच्छर और राजीव गांधी (Sri Lankan Civil War)

क्या आप जानते हैं जब 2000 भारतीय सैनिको की हत्या कांग्रेस के नोबल के कीड़े ने कर दी??आप सभी ने सुना होगा की राजीव गांधी की हत्या लिट्टे के उग्रवादियों ने कर दी थी..मगर मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या तरह ये कम ही लोग जान पाये की राजीव गांधी की हत्या क्यों की गयी?? श्रीलंका में लिट्टे
दो दिन पहले एक कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने "नोबल का मच्छर" नरेंद्र मोदी  की पाक यात्रा के लिए उपयोग किया तो राजीव गांधी जी याद आ गए..
अंग्रेजो के जमाने में तमिलो की एक बडी सख्या श्रीलंका(सीलोन) के चायबगानो में नौकरों के रूप में कार्यकरने ले जाई गयी जो कालान्तर में वहीँ बस गयी. वहां का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला समुदाय सिंहली था। 1948 में स्वतंत्रता के बाद श्रीलंका में तमिलो को नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया गया क्योंकि वो भारत से आ के बसे थे. बाद में बने कानूनों के अनुसार भारतीय मूल के तमिल श्रीलंका में जहां वो सदियो पहले आ के बस गए थे दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में थे जैसे वर्तमान में पाकिस्तानी हिंदुओं का हाल है..विरोध हुआ.अत्याचार हुआ.. तमिलो के विरोध में दंगे हुए हजारो तमिल मारे गए..और तमिलो की पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा के तमिलों के गृहभूमि पूर्वी प्रान्त में सिंहलियों को बसा दिया गया..श्रीलंका के तमिलो पर भारत आने या आके पढाई करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया..भारत के अखबार, पत्रिकाएंश्रीलंका में प्रतिबंधित कर दिए गए..तमिलो को स्कूलों कॉलेजों में दाखिल नहीं मिलता था. तमिलों की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले जाफना में तमिल प्रतीकों पुस्तकालयों को आग लगा दी गयी..
परिणामस्वरूप अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक हो चुके तमिलो ने छोटे छोटे समूहों में सशत्र विद्रोह कर दिया. उसके बाद पुरे देश में तमिल विरोधी भावनाएं बढ़ गयी और सडको पर तमिलों का कत्लेआम और नरसंहार होने लगा..सरकार और तमिलो दोनों का खून बहा और कालान्तर में पीड़ित शोषित तमिल समुदाय को "वेलुपिल्लई प्रभाकरण" नाम के विद्रोही नेता नेें सभी तमिल विद्रोही समूहों को एक बैनर के नीचे ला के "LTTE"(Liberation Tigers of Tamil Eelam) बना के अलग तमिल इलम की मांग करते हुए युद्ध शुरू कर दिया और श्रीलंका के कई क्षेत्रों में कब्ज़ा कर लिया..उनकी अपनी सेना..अपने हथियार..अपने विमान सब थे..
चूकी श्रीलंका सरकार श्रीलंका के तमिलों के नरसंहार और दमन पर लगी थी इसलिए श्रीलंका से सटे भारत में बसे तमिल इसका विरोध करने लगे..तात्कालिक राजीव गांधी कांग्रेस सरकार ने मौके की नजाकत भांपते हुए लिट्टे और प्रभाकरण का परोक्ष समर्थन कर दिया जिससे की तमिलनाडु में कांग्रेस का वोट बैंक मजबूत हो जाये.भारतीय सेना ने तमिलनाडु के जंगलों में बकायदा ट्रेनिंग कैम्प लगा के प्रभाकरण और लिट्टे के लड़ाकों को
सैनिक ट्रेनिंग,हथियार और पैसे उपलब्ध कराये..इससे तमिलनाडु में लिट्टे की जड़ और मजबूत ही गयी..लिट्टे का प्रमुख प्रभाकरण नई दिल्ली में राजीव गांधी का ख़ास मेहमान हुआ करता था जिसकी कांग्रेस सरकार राजकीय मेहमान की तरह आवभगत करती थी..अब श्रीलंका सरकार भी चाहती थी की लिट्टे के बढ़ते प्रभाव के कारण श्रीलंका टूट सकता है अतः कोई समझौता किया जाये इसमें भारत प्रमुख भूमिका अदा करता..
इसी समय सन 1987 में भारत के #कांग्रेसी #प्रधानमंत्री #राजीव_गांधी को #नोबल_के_मच्छर ने काट खाया और #शांति_के_नोबल पाने के चक्कर में राजीव गांधी ने #ऐतिहासिक_भूल करते हुए श्रीलंका सरकार और अन्य छोटे छोटे श्रीलंकाई तमिल समूहों के साथ समझौता कर डाला और भारत की सेना को शांति स्थापित करने के लिए श्रीलंका भेज दिया..सबसे आश्चर्यजनक ये था की सबसे बड़े LTTE समूह, जिसके स्वयं के सेना से लेकर हवाईजहाज तक थे,जिसे भारतीय सेना से ट्रेनिंग और हथियार मिले,जिसे राजीव गांधी सरकार ने पैसे दिए,और जिसका प्रमुख प्रभाकरण भारतीय सरकार का राजकीय मेहमान था उसे इसे समझौते से अलग और किनारे रक्खा गया.. मतलब जो समझौता हुआ वो सिर्फ नाम का हुआ और जो शांति के नाम पर भारत की सेना वहां भेजी गयी थी उसका असली काम वहां जा कर श्रीलंका के अनजान अपरिचित जंगलों में लिट्टे और प्रभाकरण के उन सैनिको से युद्ध करना था जिन्हें ट्रेनिंग भी उन्होंने ही दी थी,जिनके वास हथियार भी भारतीय सेना के थे जिनके पास स्ट्रेटेजी भी भारतीय सेना की थी...
अब श्रीलंका में भारतीय सेना को उनके द्वारा ट्रैंड लड़ाके,उनके द्वारा ही दिए हथियार से अपने जंगलो में चुन चुन कर मार रहे थे और #राजीव #गांधी जी नोबल शांति पुरस्कार की प्रतीक्षा में लगे रहे..
उस समय सेना में एक बात प्रचलित थी की इन्डियन एयर फ़ोर्स या एयर इण्डिया के जिस विमान से लिट्टे और प्रभाकरण से लड़ने के लिए भारतीय सैनिक और हथियार भेजे जाते थे उसी विमान से LTTE और प्रभाकरण के लिए भी हथियारों का बक्सा भेजा जाता था.
2000 से ज्यादा भारतीय सैनिक राजीव गांधी के असफल नोबल पुरस्कार अभियान में मारे गए।।अंततः रोज सैनिको की मौत के कारण सेना और जनता के दबाव में श्रीलंका से भारतीय सेना 1990 में वापस बुला ली गयी...सरकारी आकड़ो में 1255 सैनिको की मौत दर्ज की गई..लिट्टे का भी नुक्सान हुआ और श्रीलंका इस कूटनीतिक नोबल कामयाबी पर प्रसन्न था..21 मई 1991 को श्रीपेरुंबुदुरकी रैली में धनु नामक लिट्टे की एक आत्मघाती हमलावर ने राजीव गांधी की हत्या कर दी और नोबल के इस मच्छर ने एक प्रधानमंत्री को मार डाला...
इसके बाद प्रभाकरण और श्रीलंका सेना में युद्ध चलता रहा.. सन 2009 में अप्रैल के महीने में एल टापू पर लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण को घेर लिया गया।उसी समय भारत में लोकसकभा चुनाव हो रहे थे। प्रतीक्षा इस बात की थी की यदि राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार बनती है तो प्रभाकरण को राजनैतिक अपराधी माना जायेगा और कांग्रेस की सरकार बनी तो गांधी परिवार के दुश्मन को सजा दी जायेगी..16 मई 2009 को भारत में चुनाव परिणाम घोषित हुए..भाजपा चुनाव हार गयी..कांग्रेस की सत्ता वापस आई. नतीजे आने के 24 घंटे के अंदर कांग्रेस और भारतीय सरकार की हरी झंडी मिलते ही 17 मई 2009 को भारतीय तमिलो के अधिकारो के लिए आजीवन लड़ने वाले "वेणुपिल्लई प्रभाकरण" के सर में गोली मार कर उसकी हत्या कर दी गयी...
प्रभाकरण के मरने के बाद भारतीय तमिलो पर जो अत्याचार शुरू हुआ उसे मानवता के सबसे बड़े अत्याचारों में एक माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कई बार इसपर हस्तक्षेप किया..मगर नरसंहार और तमिलो का दमन जारी रहा....
यदि एक #शांति_के_नोबल वाले मच्छर ने राजीव गांधी को नहीं काटा होता तो आज श्रीलंका ने जो चीन को हम्बनटोटा बंदरगाह देकर हमे घेरने में सहायता की है वो नहीं होता..शायद 2 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिक नहीं मरते..उनके बच्चे अनाथ नहीं होते..उनकी स्त्रियां विधवा नहीं होती... शायद एक स्वतंत्र तमिल ईलम प्रभाकरण के नेतृत्व में भारत का मित्र राष्ट्र होता..शायद राजीव जिन्दा होते.. शायद लाखो तमिलों की बर्बर हत्या नहीं हुई रहती......

आशुतोष की कलम से
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रविवार, 13 जुलाई 2014

रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश- एक सही निर्णय??( FDI IN DEFENCE)

पिछले कुछ दिनों से एक बहस छिड़ी है की रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश(FDI) को जो अनुमती दी गयी है उससे देश का फायदा होगा या नुकसान.हालांकि रक्षा विशेषज्ञ इस पर एकमत दिख रहे हैं.आगे का लेख लिखने से पहले मैं आप स्पष्ट करना चाहता हूँ की स्वयं में मैं स्वदेशी का एक प्रबल समर्थक हूँ और दूसरा की ये लेख नरेंद्र मोदी सरकार की किसी नीति को सही ठहराने के उद्देश्य से नहीं लिख रहा हूँ,इस काम के लिए भारतीय जनता पार्टी के पास काफी प्रबुद्ध प्रवक्ता हैं. वापस मुद्दे पर आते हुए रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश के पक्ष या विपक्ष में तर्क करने से पहले हमे कुछ रक्षा सम्बन्धी जरूरतों और उसके आपूर्ति के प्रबंधन के बारे में समझना होगा. पिछले बीस-पच्चीस साल में रक्षा क्षेत्र में अगर बड़ी आपूर्ति के नाम पर रुसी नेवी द्वारा रिटायर किया हुआ एडमिरल गोर्शकोव नामक युद्धक पोत(जिसे बाद में स्वदेशी नाम आईएनएस विक्रमादित्य दिया गया ) और मुलायम सिंह के रक्षामंत्री रहते हुए सुखोई विमानों की खरीद है, जो पूरी तरह से बिदेशी खरीद थी.
आजादी के बाद ही किसी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में शोध और उत्पादन को बढ़ावा नहीं दिया इसी कारण 1962 की हार के बाद से अब तक चीन से हमने आँख मिलाने की हिम्मत नहीं की और अपना प्रमुख प्रतिद्वंदी पाकिस्तान जैसे पिद्दे से देश को मान लिया जो पहले से ही गृहयुद्ध के कारण तबाह है. इधर पच्चीस सालो में सामरिक रूप से चीन ने हमे चारो और से घेरते हुए मुलभूत ढांचे में अत्यंत तीव्र गति से विकास कर लिया है.जिस चौकी तक हमारे सैनिको को पहुचने में 3 दिन लगेगा चीन ने वहां तक रोड बना के 4 घंटे में सप्लाई का प्रबंध कर दिया है. जब चीन से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो भारत की स्थिति शायद कही नहीं ठहरती है . चाहे हमारे तोप हो मिसाइल हो, जहाज हो या नेवीवारशिप सबमे चीन हमसे काफी आगे है.और यही बात किसी भी रीढ़वाली राष्ट्रवादी सरकार को पीड़ा देगी की वो अपने पडोसी के सामने घुटने टेकते हुए घिसट रहा है क्यूकी संसाधन नहीं उपलब्ध नहीं  हैं. विश्व की सबसे बहादुर सेना हताश निराश है क्यूकी उसके पास लड़ने के लिए बंदूके नहीं हैं.यह बात पूर्व सेना प्रमुख के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र से स्पष्ट है. अब यदि वर्तमान सरकार स्वदेशी फैक्ट्रियां डाल कर विमान युद्धपोत और अन्य रक्षा उपकरण बनाने लगे तो कम से कम यह 25 साल की परियोजना होगी. इस समय अंतराल की वास्तविकता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं की लगभग  बीस साल से स्वदेशी विमान “तेजस” का निर्माण जारी है और आज तक वह विमान वायुसेना के मानको को पूरा नहीं कर पाया है जिससे उसकी सेवाओं का उपयोग भारतीय वायुसेना कर सके. इसमें 6 साल आदरणीय वाजपेयी जी के कार्यकाल के भी है जिनकी सरकार विकास सम्बन्धी फैसले में अव्वल थी.उस पर भी ध्यान देने योग्य बात ये है की इस विमान का इंजन बिदेशी है जिस पर हिन्दुस्थान का ठप्पा लगाया जायेगा .तो आप कल्पना कीजिये बिना इंजन के सिर्फ नियंत्रण प्रणाली और ढांचा पिछले बीस साल से बन रहा है सफल नहीं हुआ अगर इस आधार पर चीन से आँख मिलाने की परिकल्पना करे तो शायद पूरा पूर्वोत्तर भारत चीन के हवाले करना पड़ेगा और हमारी आँख फिर भी नीचे रहेगी.
इससे इतर जो बड़ी समस्या है की काल्पनिक रूप से यदि इतना बड़ा तंत्र खड़ा कर लिया जाये तो उसके लिए पैसे कहाँ से आयेंगे.जाहिर है इस पर ये कहना की कालेधन को स्विट्जरलैंड से माँगा कर रक्षा का आधारभूत ढांचा तैयार होगा एक कोरी कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं हैं. काल्पनिक रूप से ये भी मान ले की वित्त का प्रबंध हो गया तो क्या हमारे पास उस उच्च स्तर की तकनीकी और प्रशिक्षित प्रतिभाएं हैं . एक रक्षा विशेषज्ञ से संवाद के दौरान उन्होंने एक बहुत मौलिक प्रश्न उठाया की यदि भारत ने तेजस जैसे विमान की एक फैक्ट्री विकसित भी ले तो सिर्फ 100 विमानों के लिए विमान निर्माण का ढांचा नहीं बनाया जा सकता उसके बाद उसे ग्राहक कहाँ से मिलेंगे क्यूकी बिना शोध के हमारी तकनीकी 30 साल पुरानी होगी और रूस और फ़्रांस जैसे बड़े उत्पादक उससे कम दाम में उच्च तकनीकी उपलब्ध करा देंगे.
नासा या अन्य देशों में हमारी प्रतिभाएं सफल है क्यूकी वहां का शोध का आधारभूत ढांचा अत्याधुनिक एवं विश्वस्तरीय है.वहां सिर्फ हमारी प्रतिभाओं को मूल्य संवर्धन (VALUE ADDITION) करना है,जबकि इसके उलट भारत में पूर्ववर्ती सरकार की उपेक्षा के कारण शोध(RESEARCH) का आधारभूत ढांचा न के बराबर है. हमारी समस्या यही है की हम खीच खांच के घरेलू उत्पादन के बजट का जुगाड़ कर लें तो शोध के नाम पर “ऊंट के मुह में जीरा”. जबकि शोध और उत्पादन दोनों दो स्तर हैं एक विश्वस्तरीय उत्पाद के लिए. और उसमे भी सबसे प्रमुख है भारत में शोध क्षेत्र में काम न होना.सर्वप्रथम सरकार प्रथम स्तर पर कार्य कर ले फिर दूसरे स्तर उत्पादन पर कुछ सोचा जा सकता है..तो क्या जब तक ये सब स्तर हम प्राप्त न हो हम कोई भी उत्पाद बिदेश से न मंगाए या बिदेश पर निर्भर न रहे और अपने सैनिको और जनता को कांग्रेस के शासन काल की तरह मरने के लिए छोड़ दें?मेरी समझ से कोई भी ये नहीं चाहेगा की संसाधन की कमी से हमारे वीर सैनिक और निर्दोष जनता मारी जाये तो फिलहाल एक ही विकल्प बचता है बिदेश से रक्षा उपकरणों की खरीद और यही हम न्यूनाधिक मात्रा में कर भी रहे हैं. शोध और निवेश के अलावा रक्षा मोर्चे पर बिदेशों से रक्षा उपकरण मंगाने एवं FDI को हरी झंडी देने के पीछे दो और प्रमुख कारण हैं जिसे ज्यादातर लोग नजअंदाज कर रहे हैं प्रथम है तकनीकी स्थानान्तरण(Techonology Transfer) तो दूसरा है उपकरणों के मरम्मत सम्बन्धी कलपुर्जे (Spare Part) के व्यापार का खेल.
हम जितने भी देशों से रक्षा उपकरण आयात करते हैं उसमे से रूस को छोड़कर कोई भी देश तकनीकी  स्थानान्तरण(Techonology Transfer) नहीं करता है. मतलब हमने कोई उपकरण ख़रीदा तो एक तकनीकी दल उसके प्रचालन की रखरखाव ट्रेनिंग ले कर आएगा और कंपनी ने अपना पल्ला छुड़ा लिया. अब यदि वही कंपनी यहाँ फैक्ट्री बनाती है तो हमारी सरकार का उसपर पूर्ण नियंत्रण होगा क्यूकी उसका निवेश हिन्दुस्थान में लगा होगा तो हमारी रक्षा व्यवस्था के साथ सहयोग को अस्वीकार करना आसान नहीं होगा.दूसरी और ऐसा संभव नहीं है की फैक्ट्री की सम्पूर्ण जनशक्ति (मैनपॉवर) बिदेश से आये.यहाँ फैक्ट्री होगी तो उस तकनीकी में हजारो भारतीय भी दक्ष होंगे ज्ञातव्य हो ये तेल साबुन बनाने की तकनीकी नहीं होगी,ये तकनीकी रक्षा उपकरणों से सम्बंधित होगी. जो आगे हमारे व्यवस्था के स्वदेशीकरण में लाभदायक होगा. हमारी सरकार का इस बात पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा की यहाँ से सस्ती जनशक्ति और संसाधन लेकर माल यहाँ बना कर अन्य देशों में न बेचा जाये मतलब हिन्दुस्थान में लगी फैक्ट्री का अधिकांश उत्पादन यही के लिए होगा.शोध कार्य वो अन्य इकाईयों(subsideries)के माध्यम से कर के यहाँ उपयोग कर सकते है.
रक्षा उपकरणों के मरम्मत सम्बन्धी कलपुर्जों का एक बहुत बड़ा बाजार सक्रीय है जो एक बार उपकरण खरीद लेने के बाद कलपुर्जों के नाम पर मनमाने ढंग से मोटी रकम हिन्दुस्थान से वसूल करता है.जैसे सुखोई विमान हमने रूस से लिया उसका नोज संयुक्त रूस के किसी अन्य भाग में बना इंजन कही और ढांचा कहीं और बाकी उपकरण कही और. आज भारतीय वायु सेना के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है की रूस के विघटन के बाद उसे अलग अलग देशों से स्पेयर पार्ट खरीदने पड़ते हैं.कुछ देशों ने फैक्ट्रियां बंद कर दी अब किसी भी कीमत पर वो कल पुर्जे नहीं मिल सकते और सुखोई विमान उड़न ताबूत बन चुके हैं.यदि ये स्पेयर पार्ट हिन्दुस्थान में उपलब्ध होते तो कई हजार करोड का फायदा एवं कई विमानों की आयु बढ़ सकती थी. यही हाल अन्य रक्षा उपकरणों में भी है.
एक अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु ये है की यदि सामान यहाँ बना तो बिदेशी मुद्रा भंडार बचेगा जो वर्तमान अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है और उतनी ही पूंजी में हमें ज्यादा उपकरण मुहैया होंगे जिनके उत्पादन प्रक्रिया पर भारत सरकार का पूरा नियंत्रण अपने विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से होगा.इसके अलवा कुछ संशय इस बात पर हैं की हमारा पूरा रक्षा तंत्र बिदेशियों के हाथ में चला जायेगा तो यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है विदेशी निवेश कभी भी कोर सेक्टर जिससे देश की सुरक्षा में समस्या आ सकती है उसमे नहीं होता है. अभी फिलहाल में तो ये पेरिफेरल सेक्टर में है. जैसे नाईट विजन उपकरण आदि. कोई भी उपकरण खरीदने के बाद भारतीय रक्षा तंत्र अपनी आवश्यकता के अनुसार उसमे परिवर्तन करता है जिससे किसी अन्य देश को जो उसी उत्पादक कंपनी से वही उपकरण लेता है,उससे हमारे उपकरण के कोर आपरेशन की गोपनीयता कुछ स्तर तक बनायीं जा सके.



जहाँ तक राजीव भाई के विचारों के समर्थन करने वाले बंधुओं का सवाल है राजीव भाई ने स्वयं अपने व्याख्यानों में शून्य तकनीकी उत्पादों जैसे तेल मसाला साबुन आदि में बिदेशी निवेश का विरोध किया है . उन्होंने स्वयं अपने व्याख्यानों में कहा है की कोई भी बिदेशी कंपनी भारत में मिसाइल या कोई रक्षा उपकरण बनाने की फैक्ट्री क्यों नहीं लगाती?? यदि आज उनकी बात को आंशिक रूप से सत्य किया जा रहा है तो इसका निषेध क्यों?? स्वदेशीकरण धीमी गति से चलने वाली लम्बी प्रक्रिया है. जो पांच साल में नहीं हो सकती हाँ मगर वर्तमान सरकार को सामानांतर रूप से स्वदेशी तकनीकी पर शोध को पर्याप्त अवसर देना होगा तथा ऐसे व्यवस्था की नींव रखनी होगी जिससे आने वाले दशक में हिन्दुस्थान कम से कम अपनी रक्षा जरूरतों का कुछ भाग में स्वावलंबी हो सके..

आशुतोष की कलम से 
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