शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

सोशल मिडिया से युद्ध का ऐलान करते महारथी (social Media War)

#War #युद्ध
◆ दृश्य एक: 24 दिसम्बर 1999 को इस्लामिक आतंकवादियों ने  में इंडियन एयरलाइंस फ्लाईट 814 का
आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया और उसे अफगानिस्तान के कंधार ले गए.. 178 यात्री थे जिसमें से एक यात्री रूपीन कत्याल विरोध करने के कारण मारा गया. बाकी 177 मुसाफिरों ने भारीे हथियारों से लैस आतंकियों का कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई..

◆ दृश्य दो:  मुसलमान आतंकवादीयों ने ग्यारह सितम्बर 2001 अमेरिका में ट्वीन टावर आतंकवादियों ने उड़ाया..यात्रियों से भरे एक हाइजैक जहाज को आतंकवादी व्हाइट हाउस की ओर ले जा के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश के आवास पर गिराना चाहते थे मगर यात्रियों ने आतंकियों से लड़ाई की.काकपिट तक पहुचता देख "अल्लाह हूँ अकबर के नारे के साथ" मजबूरी में आतंकियों को विमान पहले गिराना पड़ा. सभी यात्री मारे गये..सभी आतंकी मारे गए।।व्हाइट हाउस सुरक्षित रहा..

◆ दृश्य तीन: आतंकवादी अयूब_अल_खज्जानी ने एम्स्टर्डम से पेरिस जा रही एक हाई स्पीड ट्रेन में एक47 और बमो से लैस होकर हमला किया। ट्रेन में यात्रा कर रहे अमरीकी एंथोनी सालडर, एलेक स्कारलाटोस और स्पेंसर स्टोन ने इस्लामिक आतंकवादी #अयूब_अलखज्जानी से ट्रेन में भिड़ गए और आतंकवादी को धर दबोचा..इस गोलाबारी में दर्जनों की जान जा सकती थी मगर तीन लोग गंभीर रूप से घायल हुए..

◆दृश्य चार:पुनः कांधार हाइजैक से सम्बंधित है..विमान अपहरण के बाद यात्रियों के परिजनों की इकट्ठा भारी भीड़। सभी का कहना था की किसी भी कीमत पर उन्हें उनके परिजन जीवित चाहिए एक की भी जान अब नहीं जानी चाहिए..सरकार चाहे आतंकी छोड़े या वार्ता करे सेना भेजे या कोई भी कीमत दे मगर कोई भी मरना नहीं चाहिए..अंततः अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस समेत सभी दलों की सहमति से 3 खूंखार आतंकवादियों को छोड़ा और सभी यात्री वापिस आये..

◆ दृश्य पांच: वर्तमान का दृश्य...भारत में हुए पठानकोट आतंकी हमले के बाद हम सब सोशल मिडिया से युद्ध की घोषणा कर रहे है..मैं सन 1999 के पुराने आर्काइव वीडियो खंगाल रहा हूँ जिसमे विमान हाइजैक में फसे यात्रियों के परिवारों के कुछ लोग ये कहते मिल जाए  "मरते हैं परिजन तो मरने दो मगर आतंकवादियों को रिहा करके घुटने मत टेको..हमें परिजनों से प्यारा हमारा देश है.."
कई घंटो की खोज के बाद ऐसा वीडियो मिल नहीं पाया...आप में से किसी को मिल जाए तो जरूर भेजिएगा..मुझे वो वीडियो Narendra Modi के पास भेजकर उनको याद दिलाना है की हम लोग सिर्फ फेसबुक से तोप नहीं चलाते, आप युद्ध कीजिये विपत्ति काल में  सैनिको के साथ साथ हम आम भारतीय भी अपने परिवार समेत मरने को तैयार थे.

आशुतोष की कलम से
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ट्वीट :   @ashu2aug 

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

पाकिस्तान नीति :मोदी का यू टर्न या कांग्रेसी कुकर्मों का फल

‪#‎मोदीसरकार‬ ‪#‎अच्छेदिन‬ ‪#‎यूटर्न‬?
सत्ता से बाहर रहकर युद्ध और सर काटने की बात करने वाली भाजपा आज युद्ध से भाग रही है..मोदी ने U टर्न मार लिया??आओ कांग्रेसियों,वामियों,आपियों,पापियों मैं बताता हूँ की पाकिस्तान से युद्ध क्यों नहीं कर सकता मोदी..
दरअसल ये प्रधानमंत्री मोदी का ये U टर्न तुम्हारे कुकर्मो का फल है..‪#‎कांग्रेस‬(04-14) और ‪#‎वामपंथियों‬ (04-09)ने कहाँ भारत के रक्षा तंत्र को पंहुचा दिया ●वामपंथी और कांग्रेसियों अपने दस साल के शासन काल में भारतीय सेना,वायुसेना,BSF को ISI के एजेंटो का दूसरा घर बना दिया है तुमने जिसकी सफाई पिछले डेढ़ साल से कर रहा है Narendra Modi..और हर रोज ISI के कांग्रेसी दामाद गिरफ्तार हो रहे हैं..

● कामपंथी और अल-खान्ग्रेसियों 10 साल में तुमने कितने आयल रिजर्व बनाये??युद्ध सिर्फ बयान से नहीं लड़े जाते.आयल रिजर्व भारत के पास कितने दिनों का था जब मोदी ने सत्ता संभाली? सितम्बर 2015 से मोदी सरकार नए आयल रिजर्व बना रही है जिससे की तुम्हारे कुकर्मो और ऐय्याशियों से तबाह सेना को हिम्मत मिले..
● युद्ध के लिए कम से कम 40 दिन की सामग्री होनी चाहिए.. इटली वाली बाई और मौनी बाबा की कृपा से सेना के पास 40 दिन तक चलने वाला सिर्फ 10 फीसदी गोला बारूद ही था। जबकि 50 फीसदी से ज्यादा गोला-बारूद तो केवल एक हफ्ते तक के लिए मौजूद था।
● चीन के पास 60 से 80 दिन का रिजर्व है और भारत के पास??कांग्रेसियों तुमने दलाली के चक्कर में सिर्फ 7 दिन का रिजर्व रख छोड़ा था..और बाते करोगे को मोदी क्यों युद्ध नहीं कर रहा..
●याद है अल-खान्ग्रेसियों तुमने 10 साल में सेना को इतना तबाह कर दिया की भारतीय सेना का जनरल तुम्हे चिट्टी लिखता रहा,चिल्लाता रहा की भारत की सेना के पास लड़ने को हथियार नहीं और तुम लोग 2G,3G जीजाG,कॉमनवेल्थ और कोयला से अपना मुह काला करते रहे..सेना चीखती रही और तुम अपना बिस्तर गर्म करके जज बनाने में व्यस्त रहे..
● विमानों खरीद में तुमने इतनी घटिया दलाली की राजनीति चली की दलाली न मिलने के कारण 10 साल में विमानों को खरीदने का आर्डर नहीं दे पाये वो तो भला हो नरेंद्र मोदी का जिन्होंने "राफेल डील" को खुद ही फ़्रांस जा के फाइनल करके हताश हो रही एयरफोर्स को नयी हिम्मत दी वरना कांग्रेस का बस चलता तो उड़नताबूत बन चुके आउटडेटेड MIG में ही मरने देती वायुसेना के पायलटों को..यही डील कांग्रेसियों तुमने पहले फाइनल कर दी होती तो आज तक ये विमान हमारे एयरफ़ोर्स के हैंगरों में पहुच चुके होते..
● गलती से कांग्रेस ने हेलीकॉप्टर और सेना के ट्रक खरीद लिए तो उसे "ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाला" और "टाट्रा ट्रक घोटाला" नाम से ये देश जानता है..
● अब आते हैं नौसेना की स्थिति पर, याद है न क्या हालात बना दी थी तुम कांग्रेसियों ने 2004 से 2014 तक हादसों की झड़ी लगा दी और नौसेना की शान INS सिंधुरक्षक का खड़े खड़े तबाह हो जाना और 18 नौसैनिकों का मरना वो जख्म है जिसे सिर्फ एक हादसा नहीं माना जा सकता था। नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके जोशी ने तो इस्तीफा दे दिया मगर उसके बाद फिर हादसे का होना ये बताने को पर्याप्त था की 10 सालों में नेविवारशिप का रखरखाव हुआ नहीं या हुआ भी तो बड़ी हथियार दलाल लाबी इसमें सम्बद्ध थी..
● घोटाले और मुफ्तखोरी से तबाह देश का खजाना तुमने मोदी को दिया था जो कोई युद्ध नहीं झेल सकता था। यही कारण है की उस देश के खजाने को भरने के चक्कर में आज मोदी कभी सेस बढ़ाता है तो कभी पेट्रोल डीजल पर वैट बढ़ा के देश को मजबूत करता है और हमारी थोक के भाव गालियां भी सुनता है.
● अब कांग्रेस और वामपंथियों की अवैध राजनैतिक संतति,टोपी वाली नौटंकी गैंग के गुर्गों..तुम लोग तो कांग्रेस से भी गए गुजरे हो तुम्हारी नौटंकी चलती ही है फ्री के वाईफाई, फ्री के बिजली,फ्री के पानी पर तो अगर युद्ध हुआ तो तुम्हे जीत हार से मतलब नहीं होगा तुम्हे मतलब होगा युद्ध के बाद निश्चित बढने वाली महंगाई से.. महंगाई बढ़ गई जी..मोदी ने टैक्स लगा दिया जी..LG हमे काम करने दे रहा जी...ऐंड सो आन नौटंकी आन इट्स पीक..
★★★ अब कुछ मानसिक रूप से अपरिपक्व बच्चे, ये कहेंगे की अब तो मोदी है जो करना है कर लो...तो भाई जहाजो के आर्डर मोदी खुद फ़्रांस में देकर आया है...जहाज का आर्डर दिया है न की पिज्जा का जो दो मीनट में बनकर आधे घंटे में आ जाये, कुछ साल लगेंगे बनाने और डिलिवरी में..सेना का आधुनिकीकरण जारी है.नए आयल रिजर्व अगस्त सितम्बर 2015 से बनने शुरू हो गए..करोडो के हथियारों की खरीद को रक्षामंत्री मनोहर पारिकर ने अप्रूव कर दिया. कांग्रेस की चहेती हथियारों की दलाल लाबी को लात मार के भगा दिया गया है..एक एक सौदे पर PMO की नजर है...Rajnath Singh के विभाग वाले सेना व एयरफोर्स में कांग्रेस के ISI वाले दामादो को रोज पकड़ रहे हैं.आप के पास अरबो रूपये हो तो भी एक मकान बनाने में समय लगता है तो यहाँ तो पूरे रक्षा तंत्र का फिर से जीर्णोद्धार करना है ऐसे तीव्र गति से काम हुआ तो 5 साल में खड़े होने लायक होंगे और कम से कम 10 साल में दौड़ने लायक..और यदि जैसा पहले कांग्रेसी जमाने में था वैसी स्पीड रही तो चीन है ही खड़ा 1962 दोहराने के लिए....
आशुतोष की कलम से

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

नोबल का मच्छर और राजीव गांधी (Sri Lankan Civil War)

क्या आप जानते हैं जब 2000 भारतीय सैनिको की हत्या कांग्रेस के नोबल के कीड़े ने कर दी??आप सभी ने सुना होगा की राजीव गांधी की हत्या लिट्टे के उग्रवादियों ने कर दी थी..मगर मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या तरह ये कम ही लोग जान पाये की राजीव गांधी की हत्या क्यों की गयी?? श्रीलंका में लिट्टे
दो दिन पहले एक कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने "नोबल का मच्छर" नरेंद्र मोदी  की पाक यात्रा के लिए उपयोग किया तो राजीव गांधी जी याद आ गए..
अंग्रेजो के जमाने में तमिलो की एक बडी सख्या श्रीलंका(सीलोन) के चायबगानो में नौकरों के रूप में कार्यकरने ले जाई गयी जो कालान्तर में वहीँ बस गयी. वहां का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला समुदाय सिंहली था। 1948 में स्वतंत्रता के बाद श्रीलंका में तमिलो को नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया गया क्योंकि वो भारत से आ के बसे थे. बाद में बने कानूनों के अनुसार भारतीय मूल के तमिल श्रीलंका में जहां वो सदियो पहले आ के बस गए थे दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में थे जैसे वर्तमान में पाकिस्तानी हिंदुओं का हाल है..विरोध हुआ.अत्याचार हुआ.. तमिलो के विरोध में दंगे हुए हजारो तमिल मारे गए..और तमिलो की पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा के तमिलों के गृहभूमि पूर्वी प्रान्त में सिंहलियों को बसा दिया गया..श्रीलंका के तमिलो पर भारत आने या आके पढाई करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया..भारत के अखबार, पत्रिकाएंश्रीलंका में प्रतिबंधित कर दिए गए..तमिलो को स्कूलों कॉलेजों में दाखिल नहीं मिलता था. तमिलों की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले जाफना में तमिल प्रतीकों पुस्तकालयों को आग लगा दी गयी..
परिणामस्वरूप अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक हो चुके तमिलो ने छोटे छोटे समूहों में सशत्र विद्रोह कर दिया. उसके बाद पुरे देश में तमिल विरोधी भावनाएं बढ़ गयी और सडको पर तमिलों का कत्लेआम और नरसंहार होने लगा..सरकार और तमिलो दोनों का खून बहा और कालान्तर में पीड़ित शोषित तमिल समुदाय को "वेलुपिल्लई प्रभाकरण" नाम के विद्रोही नेता नेें सभी तमिल विद्रोही समूहों को एक बैनर के नीचे ला के "LTTE"(Liberation Tigers of Tamil Eelam) बना के अलग तमिल इलम की मांग करते हुए युद्ध शुरू कर दिया और श्रीलंका के कई क्षेत्रों में कब्ज़ा कर लिया..उनकी अपनी सेना..अपने हथियार..अपने विमान सब थे..
चूकी श्रीलंका सरकार श्रीलंका के तमिलों के नरसंहार और दमन पर लगी थी इसलिए श्रीलंका से सटे भारत में बसे तमिल इसका विरोध करने लगे..तात्कालिक राजीव गांधी कांग्रेस सरकार ने मौके की नजाकत भांपते हुए लिट्टे और प्रभाकरण का परोक्ष समर्थन कर दिया जिससे की तमिलनाडु में कांग्रेस का वोट बैंक मजबूत हो जाये.भारतीय सेना ने तमिलनाडु के जंगलों में बकायदा ट्रेनिंग कैम्प लगा के प्रभाकरण और लिट्टे के लड़ाकों को
सैनिक ट्रेनिंग,हथियार और पैसे उपलब्ध कराये..इससे तमिलनाडु में लिट्टे की जड़ और मजबूत ही गयी..लिट्टे का प्रमुख प्रभाकरण नई दिल्ली में राजीव गांधी का ख़ास मेहमान हुआ करता था जिसकी कांग्रेस सरकार राजकीय मेहमान की तरह आवभगत करती थी..अब श्रीलंका सरकार भी चाहती थी की लिट्टे के बढ़ते प्रभाव के कारण श्रीलंका टूट सकता है अतः कोई समझौता किया जाये इसमें भारत प्रमुख भूमिका अदा करता..
इसी समय सन 1987 में भारत के #कांग्रेसी #प्रधानमंत्री #राजीव_गांधी को #नोबल_के_मच्छर ने काट खाया और #शांति_के_नोबल पाने के चक्कर में राजीव गांधी ने #ऐतिहासिक_भूल करते हुए श्रीलंका सरकार और अन्य छोटे छोटे श्रीलंकाई तमिल समूहों के साथ समझौता कर डाला और भारत की सेना को शांति स्थापित करने के लिए श्रीलंका भेज दिया..सबसे आश्चर्यजनक ये था की सबसे बड़े LTTE समूह, जिसके स्वयं के सेना से लेकर हवाईजहाज तक थे,जिसे भारतीय सेना से ट्रेनिंग और हथियार मिले,जिसे राजीव गांधी सरकार ने पैसे दिए,और जिसका प्रमुख प्रभाकरण भारतीय सरकार का राजकीय मेहमान था उसे इसे समझौते से अलग और किनारे रक्खा गया.. मतलब जो समझौता हुआ वो सिर्फ नाम का हुआ और जो शांति के नाम पर भारत की सेना वहां भेजी गयी थी उसका असली काम वहां जा कर श्रीलंका के अनजान अपरिचित जंगलों में लिट्टे और प्रभाकरण के उन सैनिको से युद्ध करना था जिन्हें ट्रेनिंग भी उन्होंने ही दी थी,जिनके वास हथियार भी भारतीय सेना के थे जिनके पास स्ट्रेटेजी भी भारतीय सेना की थी...
अब श्रीलंका में भारतीय सेना को उनके द्वारा ट्रैंड लड़ाके,उनके द्वारा ही दिए हथियार से अपने जंगलो में चुन चुन कर मार रहे थे और #राजीव #गांधी जी नोबल शांति पुरस्कार की प्रतीक्षा में लगे रहे..
उस समय सेना में एक बात प्रचलित थी की इन्डियन एयर फ़ोर्स या एयर इण्डिया के जिस विमान से लिट्टे और प्रभाकरण से लड़ने के लिए भारतीय सैनिक और हथियार भेजे जाते थे उसी विमान से LTTE और प्रभाकरण के लिए भी हथियारों का बक्सा भेजा जाता था.
2000 से ज्यादा भारतीय सैनिक राजीव गांधी के असफल नोबल पुरस्कार अभियान में मारे गए।।अंततः रोज सैनिको की मौत के कारण सेना और जनता के दबाव में श्रीलंका से भारतीय सेना 1990 में वापस बुला ली गयी...सरकारी आकड़ो में 1255 सैनिको की मौत दर्ज की गई..लिट्टे का भी नुक्सान हुआ और श्रीलंका इस कूटनीतिक नोबल कामयाबी पर प्रसन्न था..21 मई 1991 को श्रीपेरुंबुदुरकी रैली में धनु नामक लिट्टे की एक आत्मघाती हमलावर ने राजीव गांधी की हत्या कर दी और नोबल के इस मच्छर ने एक प्रधानमंत्री को मार डाला...
इसके बाद प्रभाकरण और श्रीलंका सेना में युद्ध चलता रहा.. सन 2009 में अप्रैल के महीने में एल टापू पर लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण को घेर लिया गया।उसी समय भारत में लोकसकभा चुनाव हो रहे थे। प्रतीक्षा इस बात की थी की यदि राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार बनती है तो प्रभाकरण को राजनैतिक अपराधी माना जायेगा और कांग्रेस की सरकार बनी तो गांधी परिवार के दुश्मन को सजा दी जायेगी..16 मई 2009 को भारत में चुनाव परिणाम घोषित हुए..भाजपा चुनाव हार गयी..कांग्रेस की सत्ता वापस आई. नतीजे आने के 24 घंटे के अंदर कांग्रेस और भारतीय सरकार की हरी झंडी मिलते ही 17 मई 2009 को भारतीय तमिलो के अधिकारो के लिए आजीवन लड़ने वाले "वेणुपिल्लई प्रभाकरण" के सर में गोली मार कर उसकी हत्या कर दी गयी...
प्रभाकरण के मरने के बाद भारतीय तमिलो पर जो अत्याचार शुरू हुआ उसे मानवता के सबसे बड़े अत्याचारों में एक माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कई बार इसपर हस्तक्षेप किया..मगर नरसंहार और तमिलो का दमन जारी रहा....
यदि एक #शांति_के_नोबल वाले मच्छर ने राजीव गांधी को नहीं काटा होता तो आज श्रीलंका ने जो चीन को हम्बनटोटा बंदरगाह देकर हमे घेरने में सहायता की है वो नहीं होता..शायद 2 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिक नहीं मरते..उनके बच्चे अनाथ नहीं होते..उनकी स्त्रियां विधवा नहीं होती... शायद एक स्वतंत्र तमिल ईलम प्रभाकरण के नेतृत्व में भारत का मित्र राष्ट्र होता..शायद राजीव जिन्दा होते.. शायद लाखो तमिलों की बर्बर हत्या नहीं हुई रहती......

आशुतोष की कलम से
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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

बलात्कारी अफरोज की रिहाई और केजरीवाल सरकार का बलात्कार का इनाम

दिल्ली में दिसंबर 2012 में एक लड़की का बलात्कार हुआ था और उसके बाद लोहे की सरिया उसके अंगो में डालकर तड़पा तड़पा कर हत्या की गयी थी.. उस लड़की काल्पनिक नाम "निर्भया" रखा गया। महीनो तक हल्ला हुआ कानून बना कैंडिल जलायी गयी..दरिंदो की की गिरफ़्तारी हुई..इसमें से एक दरिंदा अफरोज 18 साल से कम का था,इस ने दीदी बोलकर सबसे पहले लड़की को बस में बिठाया फिर सामूहिक बलात्कार के बाद निर्भया के विभिन्न अंगो में लोहे की राड डालकर उसकी वीभत्स हत्या की। कम उम्र होने के कारण
कानून ने उसे साल बालसुधार गृह में भेजा और उसने दूध पीकर कैरम खेलते खेलते साल काट लिए. अब कानून के अनुसार उसने अपनी सजा काट ली है परन्तु इस दरिन्दे को रिहा करना क्या सभी समाज के लिए उपयुक्त होगा ?? क्या ऐसा संभव नहीं की ये दरिंदा दोबारा किसी महिला को इसी प्रकार की वीभत्स मौत देक्या इसकी संभावना नहीं की दरिंदा अफरोज दोबारा किसी लड़की को दीदी कहके उसका बलात्कार कर दे ??
ऐसे कई संशय है जिससे वर्तमान केंद्र सरकार भी सहमत है इसी कड़ी में मोदीसरकार कोर्ट से ये कह रही है की ये लड़का और खतरनाक होकर किसी और की बहन या बिटिया को निर्भया की तरह तड़पा तड़पा के मार सकता है अतः इसे किसी अच्छे NGO की निगरानी में रक्खा जाये खुला न छोड़ दिया जाए. हालाकि कोर्ट ने कानून का हवाला  देते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है..आखिरी उम्मीद राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट से है,जिसकी संभावना कम है ..
यदि इस दरिन्दे अफरोज ने खुद के 18 साल से थोडा कम होने के कारण क़ानून का फायदा  उठा के अपनी रिहाई का रास्ता बना लिया है तो क्यों न सरकार इसकी तस्वीर और पहचान सार्वजनिक कर दे जिससे फिर कोई निर्भया अफरोज की हवस और हैवानियत का शिकार न होने पाए..दूसरी ओर सबसे दुखद ये है की अरविन्द केजरीवाल ने अब उस राक्षस को खुला छोड़ने के साथ साथ उसे 10000 रूपये तथा सभी आवश्यक सहायता देने की घोषणा की है..क्या अफरोज जैसे बलात्कारी को पैसे देकर हमारी बेटियों महिलाओं की सुरक्षा होगी??  ये वोट वोट बैंक की राजनीति अब कितना और गिराएगी हमारे राज नेताओं को ??? ईश्वर न करें मगर निर्भया की जगह अरविन्द केजरीवाल जी की  अपनी बिटिया होती तो भी वोट पाने के लिए ऐसा ही करते??
दुखद है मगर आज का सत्य यही है की 20 दिसंबर को अफरोज रिहा हो जायेगा और हर छोटी छोटी बात पर भारत के प्रधानमंत्री की अवहेलना करने वाली गाली देनी वाली केजरीवाल सरकार निर्भया के बलात्कारी अफरोज  पैसे रूपये से लेकर हर आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने को प्रतिबद्ध है.. .

आशुतोष की कलम से

                                                                  (केजरीवाल सरकार देगी बलात्कारी अफरोज को 10,000 रूपये) 

रविवार, 29 नवंबर 2015

कश्मीरी हिन्दू जनसंहार एवं विस्थापन-आधुनिक इस्लामिक असहिष्णुता का अमिट हस्ताक्षर

ये पोस्ट सहिष्णुता और भाईचारे का हल्ला मचाने वालो सभी बुद्धिजीवियों को समर्पित है..आप में से ज्यादातर कश्मीर में मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा किये जनसंहार से अवगत होंगे फिर भी सहिष्णुता का तकाजा है की कुछ प्रकाश डाला जाये...

कश्मीर पहले एक हिन्दू बहुल राज्य हुआ करता था कालान्तर में यहाँ इस्लाम के अनुयायियों ने अपनी जनसँख्या बढ़ानी शुरू की और हिन्दू सर्व धर्म समभाव वाली सहिष्णुता का ढोल नगाड़े पिटता रहा..आजादी के पहले से ही इस्लामिक बर्बरता का शिकार यहाँ के हिन्दू रहे थे..इस पर विस्तृत लेख मैंने अपने ब्लॉग (आशुतोष की कलम से) पर डाला था जिसे रिपोर्ट के कारण हटा दिया गया..
आजादी के समय जो बलात्कार और हत्याए हिंदुओं की की गयी उसे लिखूं तो देश में असहिष्णुता की सुनामी आ जायेगी अतः सीधे मुद्दे पर आता हूँ।आजादी के बाद से ही इस्लामिक जेहादियों द्वारा सन्1981 तक कश्मीरी हिंदुओं पर अत्यचार किया जाता रहा और धीरे धीरे वहां 5% हिन्दू बच गए..
अब जेहादियों ने सन 1989 में ये फरमान जारी कर दिया की जो भी मुसलमान नहीं है वो "काफ़िर" है..या तो मुसलमान बनो या कश्मीर छोड़ दो..अपनी वर्षो की कमाई से बनाये मकान और पुरखो का धर्म और जमीन कौन छोड़ता है..वहां बचे हिंदुओं ने सन 1989 में मुसलमान बनने और कश्मीर छोड़ने दोनों से इनकार कर दिया..परिणामस्वरूप जेहादियों ने चुन चुन कर कश्मीरी हिंदुओं को मारना शुरू किया जिसकी कुछ झलकियों से रूह काँप उठेगी..जम्मू में बसे कुछ परिवारों से मैंने बात की जिसकी भयावहता की कहानी सुनकर आप की आत्मा काँप जायेगी और शायद आप सहिष्णुता छोड़कर हथियार उठा कर जेहादियों के सफाये में लग जाये..
इस्लामिक जेहादियों ने लोगो को घर से निकाल कर चौराहे पर गोली मार दी..(1989)
जिन हिंदुओं ने कश्मीर नहीं छोड़ा उनके स्कूल जा रहे बच्चों को कई हिस्सों में काट कर उनके टुकड़े कश्मीर घाँटी के चौराहे पर लटका दिए गए।।(1989)
दो तीन साल की हिन्दू बच्चियों का सामूहिक बलात्कार किया गया और उनकी लाश बंदूक के नोक पर पूरे इलाके में इस्लामिक जेहादियों ने लहराया..(1989-90)
एक घटना के बारे में कश्मीरी पंडित और अभिनेता अनुपम खेर कहते हैं की उनकी मामी के घर मुस्लिम  जेहादियों का नोटिस आया की मुसलमान तो तुम लोग बने नहीं अब या तो कश्मीर छोड़ दो या मरने को तैयार रहो..उन लोगो ने धमकियों पर ध्यान नहीं दिया और धमकी के तीसरे या चौथे दिन उनक एक हिन्दू पडोसी का कटा हुआ सर उनके आँगन में आ के गिरा..इस दृश्य से,उनके पूरे परिवार ने जो सामान उनकी फिएट कार में आ सका,भर के कश्मीर छोड़ दिया।इस घटना के सदमे से अनुपम खेर की मामी आज भी मानसिक रूप से थोड़ी विक्षिप्त हैं..
ऐसे कितनी घटनाएं हुई जिनके बारे में पढ़कर आप की रूह कॉपी जाती है तो सोचिये उस पिता का दर्द जिसके सामने उसकी साल  की बच्ची का इस्लामिक जेहादियों ने बलात्कार किया होगा और पूरे परिवार को मार डाला होगा..
सरकारी आंकड़ो के अनुसार 1990 में लगभग लाख कश्मीरी हिंदुओं ने कश्मीर छोड़ दिया और उनके मकानों पर वहां के स्थानीय मुसलमान जेहादियों ने कब्ज़ा जमा लिया जो आज तक है.. आज वो सभी परिवार जिनका कभी अपना घर था व्यवसाय था आज दिल्ली और जम्मू में बने शरणार्थी कैंपो में 25 सालो से रह रहे हैं..और उनके घरो में मुसलमान जेहादी काबिज हैं... 
अब मेरा प्रश्न उन सभी लोगो से हैं जो पुरस्कार लौटना,असहिष्णुता का नाटक कर रहे हैं??क्या इस जनसंहार से  बड़ी असहिष्णुता इस देश में हुई होगी आज तक??और तो और कुछ हरामी ऐसे भी थे जो इस नरसंहार के समय ही पुरस्कार ले रहे थे तब इन्हें ये देश असहिष्णु नही लगा और आज ये देश को रहने लायक नहीं पा रहे..
दरअसल ये नरेंद्र मोदी और हिंदुओं का विरोध है,क्योंकि अभी मोदी सरकार ने इन लोगो को कश्मीर में अलग टाउनशिप बनाने की बात की तो ये कांग्रेसीआतंकवादियों के सुर में सुर मिलाते पाये गएकी अलग से मकान नहीं दिया जायेगा रहना हो तो उन्ही राक्षस मुस्लिम जेहादियों के साथ रहे जिन्होंने इनकी बेटियों का बलात्कार एवं बच्चों को काट के चैराहे पर लटकाया था..
बस ये समझ लीजिये जिस देश में 80% हिन्दू हैं और इस्लामिक जेहादियों के इतने घृणित अत्याचारो के बाद भी मुसलमान सुरक्षित हैं और वो अपनी जनसँख्या बढ़ा पा रहे हैं तो समझना होगा की "हिन्दुस्थान" से बड़ा सहिष्णु देश विश्व में कोई नहीं है वरना अमेरिका जैसे देश में 9/11 के बाद टोपी और दाढ़ी देखकर स्थानीय जनता ने कार्यवाही की थी और आज तक कर रही है....
नोट: लेख में लिखी सारी बातें सत्य हैं यदि संशय हो तो गूगल पर चेक करें या किसी भुक्तभोगी हिन्दू से मिलें..पोस्ट का उद्देश्य किसी धर्म की बुराई नहीं मगर सत्यता को सामने लाना है जिसे शायद आज की युवा पीढ़ी अब तक जानती नहीं है या मानती नहीं है..
एक आखिरी प्रश्न उनसे जो "आतंकवाद का मजहब" नहीं होता का ज्ञान झाड़ते हैं..क्या ये संभव है क्षेत्र से लाख से ज्यादा लोगो को बेघर मुट्ठी भर "भटके हुए नौजवान" कर पाये जब तक इस सामूहिक नरसंहार और विस्थापन में एक पूरी कौम न लगी हो????
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 आशुतोष की कलम से 

बुधवार, 25 नवंबर 2015

बौधिक जेहाद के नये पैगम्बर आमिरखान का चरित्र बताती उसकी अवैध संतान "जान"


जून 1998 में आमिर खान की एक फ़िल्म आई थी "गुलाम". फ़िल्म के सेट पर आमिर खान की मुलाक़ात "जेसिका हाइंस्" नाम की लेखिका से हुई.इसी महिला ने अमिताभ की बायोग्राफी भी लिखी थी। धीरे धीरे आमिर ने इस बिदेशी महिला को फ़िल्मी दुनिया का चकाचौध दिखाकर अपने ऐय्याशी के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। उसके बाद आमिर ने जेसिका को प्यार के झांसे में फसा कर "लिव इन" व्यवस्था के अंतर्गत अपने वासना पूर्ति का स्थायी साधन बना लिया..समय बीतता गया और एक दिन जेसिका ने आमिर को बताया की वो गर्भवती है अर्थात आमिर खान के बच्चे की माँ बनने वाली है और आमिर से विवाह का प्रस्ताव रक्खा तो आमिर ने सबसे पहले उस महिला पर "एबॉर्शन" यानि गर्भपात कराने का दबाव बनाया मगर जब उस महिला ने बच्चे की "भ्रूणहत्या" करने से मना कर दिया तो आमिर को गर्भवती महिला के साथ रहने और उसे स्वीकारने में अपनी अय्याशी में खलल पड़ता दिखा तो उसने महिला को पहले किसी बहाने लन्दन भेजा फिर इण्डिया से खबर भिजवा दी की या तो बच्चे की "भ्रूणहत्या" करो या सारे सम्बन्ध भूल जाओ. उस महिला ने उस बच्चे को जन्म देने का निर्णय लिया और आमिर और जेसिका हाइंस के अवैध सम्बन्ध का परिणाम के रूप में एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम "जान" है..
सन 2005 में जेसिका ने बच्चे को उसका हक़ दिलाने का प्रयास किया मामला टीवी मिडिया में छाया रहा मगर आमिर खान ने ऊपर तक पहुँच और पैसे के बल पर मामला दब गया और सलटा लिया गया..आज आमिर का वो लड़का लगभग 12 साल का है और मॉडलिंग करता है..
मैंने जेहादी आमिर का "सत्यमेव जयते" आज तक नहीं देखा मगर इसने भ्रूणहत्या पर जरूर कार्यक्रम किया होगा ऐसी आशा है..आखिर ऐसी दोगलपंथी की अपने बच्चे तक को न स्वीकारो??? आज आमिर को भारत में ‪#‎असहिष्णुता‬ दिख रही है क्या अपने बच्चे को माँ के पेट में ही मारने का कुत्सित प्रयास सहिष्णुता माना जाये..ये तो एक केस है ऐसे पता नहीं कितने "जान" आमिर की ऐय्याशी के कारण विश्व के किसी कोने में किराए के बाप की तलाश में होंगे। इसी आमिर खान ने अपने बड़े मानसिक रूप से अस्वस्थ भाई और अभिनेता "फैजल खान" को आमिर ने अपने घर में जबरिया बंधक बना के रक्खा था और आमिर के पिता के कोर्ट जाने के बाद कोर्ट के आदेश पर आमिर के पिता को फैजल खान की कस्टडी मिली..
खैर ये तो है इस जेहादी अभिनेता का चरित्र जिसे हम और आप "मिस्टर परफेक्ट" और फलाना ढिमका कहते हैं। सरकारो की मजबूरी होती है इस प्रकार के प्रसिद्ध लोगो को ढोना सर पर बैठाना क्योंकि करोडो युवा ऐसे नचनियों को आदर्श बना बैठे हैं...मगर इसके पीछे हम और आप है जो इनकी फिल्मो को हिट कराते हैं ये अरबो कमा कर भी ‪#‎भारत_माता‬ का खुलेआम ‪#‎अपमान‬ करके पुरे देश को विश्व में बदनाम करते हैं.
आइये आमिर और शाहरुख़ से ही शुरुवात करें की इन नचनियों की फ़िल्म नहीं देखेंगे। अगर इन के नाच गाने पर फिर भी किसी का दिल आ गया है तो जल्द से जल्द इसकी हर रिलीज होने वाली फ़िल्म की CD को इंटरनेट मार्केट में डाल दें जिससे इन जेहादियों को मिलने वाली रेवेन्यू पर रोक लगे...
आशुतोष की कलम से
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सोमवार, 15 जून 2015

प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा और सीमा समझौता(Modi Bangladesh Visit)

मित्रों पिछले दो लेखों में सीमा समझौते का इतिहास वर्तमान एवं भारत के पक्ष के बाद आगे बढ़ते हुए जान लें की बांग्लादेश के लिए क्यों जरुरी था ये समझौता:

बांग्लादेश में जब से शेख हसीना सरकार आई है वो प्रोइण्डिया(भारत के पक्ष की) सरकार मानी जाती है. यदि आप याद कर सके तो आसाम में सक्रीय उल्फा नाम के संगठन का एक समय बहुत आतंक था और वो बांग्लादेश में ट्रेनिंग कैम्प और गतिविधिया चलाता था. शेख हसीना सरकार ने उल्फा के सभी ट्रेनिंग कैम्प ध्वस्त करके उसके चीफ अरविन्द राजखोवा समेत उल्फा के सभी टाप कमांडर्स को बांग्लादेश में पकड़ कर हिन्दुस्थान के हवाले कर दियाजिनकी गिरफ्तारियां भारत के विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों से दिखाई गयी. इसके अलावा बांग्लादेश में भारतीय इन्क्लेव्स में बसने वालों मुसलमानों को बांग्लादेश सरकार कोई सुविधा नहीं देती थी क्युकी वो भारतीय सीमा में थे. इन दो मुद्दों समेत भारत के पक्ष में खड़े होने के कारण कट्टर इस्लामिक ताकते और विपक्ष की नेता बेगम खालिदा जिया ने पाकिस्तान के शह पर शेख हसीना को घेरना शुरू कर दिया था अतः इस समझौते को आधार बना कर शेख हसीना अगले चुनाव में ये कह सकेंगी की सभी भारतीय इन्क्लेव बांग्लादेश के हुए और उसमे बसने वालों को बांग्लादेश सरकार सभी सुविधाएं देगी.इस समझौते के लिए शेख हसीना मोदी की कोई भी शर्त मानने को तैयार थी. शेख हसीना के बेटे का मोदी के अगवानी में आना भविष्य के नए समीकरण का संकेत दे रहा है.
चूकी शेख हसीना इसके बदले में भारत के साथ किसी भी सीमा तक सहयोग हेतु तैयार थी अतः भारत ने कुछ और समझौते किये जो सामरिक दृष्टि से भारत को सुरक्षित करने के लिए अत्यंत आवश्यक थे. जिसमे चीन के "string of pearls" योजना के दो बंदरगाह भारत को देना था जिसका विस्तृत विवरण पिछले लेख में दिया गया है।
चीन किस हद तक बांग्लादेश में घुसा है इसका दूसरा उदाहरण इस प्रकार समझ सकते हैं की जब 2002 के लगभग भारत में शोपिंग माल कल्चर आ रहा था उस समय तक चीन ने बांग्लादेश के कई हिस्सों में अपने खर्च से बड़े बड़े शोपिंग माल्स का निर्माण करा के अपनी स्थिति मजबूत करते हुए भारत को एक तरह से बांग्लादेश से बाहर कर के,बांग्लादेश को भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र बना दिया था.. इन सबको ध्यान में रखते हुए मोदी ने लगभग २२ समझौते किये.. चीन का व्यापारिक आधिपत्य तोड़ने और भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत ने बांग्लादेश को बिलियन डालर की क्रेडिट लाइन दी है इसके अंतर्गत भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये क्षेत्र के सामान बिलियन डालर तक बांग्लादेश को क्रेडिट अर्थात उधार पर दिए जायेंगे शर्त ये है की वो सामान भारत में बने हो। “MAKE IN INDIA” मुहीम को इससे बढ़ावा मिलेगा और 50 हजार रोजगार के अवसर तुरंत उत्पन्न हो जायेंगे. इसके साथ ही साथ हम वही सामान देंगे जिसके निर्यात में हम सक्षम हैं. मोदी ने बांग्लादेश से इस बात पर भी सहमती ले ली है की बांग्लादेश भारतीय कंपनियों के लिए SEZ बनाने के लिए जमीन देगा और उस SEZ में सिर्फ भारतीय कम्पनियाँ ही अपनी यूनिट लगा सकती हैं. इस SEZ के माध्यम से चीन क बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने की दिशा में एक कदम आगे और भारत बढेगा।।
एक अन्य समझौते के तहत भारत की जीवन बिमा कंपनी LIC(भारतीय जीवन बीमा निगम) को बांग्लादेश में व्यापार की अनुमति मिल गयी है अर्थात अब LIC अपना व्यापार पडोसी देश में भी कर सकेगी.
भारत के दृष्टि से एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात जिसपर समझौता हुआ है वह है कोलकत्ता ढाका अगरतला बस सेवा और ढाका शिलोंग गुवाहाटी बस सेवा: पूर्व में 1650 किलोमीटर की दुर्गम एवं पहाड़ी दूरी तय करके दो दिन में कोलकत्ता से अगरतला पहुचना होता था अब इस बस सेवा से दुरी लगभग 500 किलोमीटर कम हो जाएगी तथा रास्ते भी अपेक्षाकृत सुगम होंगे. और अब 14-16 घंटे में यात्री कोलकत्ता से अगरतल्ला पहुच सकेंगे.इसका सीधा असर व्यापार और दैनिक गतिविधियों पर पड़ेगा. भारतीय संसाधनों और समय की बचत होगी..
यदि समेकित रूप से भारत के पक्ष से इसका विश्लेषण किया जाए तो ये दौरा नरेंद्र मोदी के किसी भी अन्य दौरे से ज्यादा सफल है क्युकी बांग्लादेश में होने वाली हर गतिविधि भारत की आंतरिक स्थिति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव डालती है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस शानदार उपलब्धी हेतु बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं..




आशुतोष की कलम से

बांग्लादेश दौरे में नरेंद्र मोदी ने तोड़ी चीन की मोतियों की माला (string_of_pearls )


#string_of_pearls
 #बांग्लादेश #चिट्टागोंग #मोंगला
मित्रों आप से एक ऐसी सूचना साझा कर रहा हूँ जिसे हर भारतीय को जानना ही चाहिए। मोदी के बांग्लादेश से किये किसी भी समझौते के समझने से पहले चीन के बांग्लादेश और भारत के पडोसी राज्यों में भारत के घेरने की रणनीति के बारे में समझना अति आवश्यक है.
भारत को घेरते हुए चीन ने सभी पडोसी देशो में अपने बंदरगाह बना दिए थे और इन बंदरगाहो को भारत विरोधी गतिविधियों का अड्डा.. 

नक़्शे में दिखाए गए पडोसी देशो में बनाये गए string of pearls से चीन ने सागर में भारत को घेर लिया था।। इनमे प्रमुख बन्दरगाह निम्न हैं।
√ श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह
√ पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह
√ बांग्लादेश में चिट्टागोंग और मोंगला दो बंदरगाह
√ मालदीव में मारा बंदरगाह
√ म्यांमार में क्यौक्पयु बंदरगाह।
चाइना इन्हें string of Pearls “मोतियों की माला” कहता था. भारत की दृष्टि से चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट अत्यंत संवेदनशील थे।इन दोनों को चीन ने बांग्लादेश में बनाया था और वहां से अपनी गतिविधिया चलाता रहता था. मोदी ने सीमा समझौते के साथ ये समझौता किया की चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट अब भारत के उपयोग के लिए खोले जायेंगे और अब चिट्टागोंग और मोंगला पोर्ट भारत की गतिविधियों हेतु उपलब्ध हैं. मतलब चीन की string of pearls के दो मोती भारत ने तोड़ कर "श्रीलंका से बांग्लादेश तक" सागर में खुद को काफी हद तक सुरक्षित कर लिया।। इसमें सबसा बड़ा झटका चीन को लगा है जिन बंदरगाहों को बनाकर उनसे वो भारत को घेरना चाहता था अब उन बंदरगाहों से भारत अपनी गतिविधियाँ चलाएगा और करोडो डालर खर्च करने के बाद चीन अब हाथ मल रहा है उसके हाथ कुछ नहीं आया ।
जो लोग रेत में सर डाले शुतुरमुर्ग की तरह मोदी के बिदेश दौरों और बांगलादेश से सीमा समझौते की आलोचना में लगे थे,क्या कभी इस बिंदु पर ध्यान दिया?? शायद पूर्व में ध्यान दिया होता तो चीन से हारे नहीं होते..UPA 1 चीन समर्थक कमुनिष्ट बैसाखी पर था अतः उन्होंने कुछ नहीं किया UPA2 घोटालो में व्यस्त था तो उन्होनें कुछ नहीं किया।अब मोदी चीन के चक्रव्यूह को तोड़ रहे हैं तो इन सभी द्रोहियों को समस्या हो रही है। एक व्यक्ति भारत को विश्व में स्थापित कर रहा है। सीमाओं को सुरक्षित कर रहा हैकम से कम उसका समर्थन नहीं तो बेकार विरोध भी मत करें।
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आशुतोष की कलम से




नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा और भारत बांग्लादेश सीमा समझौता (indo bangladesh border agreement)

#भारत_बांग्लादेश_सीमासमझौता  
नरेद्र मोदी का बांग्लादेश दौरा,ऐतिहासिक सीमा समझौता- इतिहास के पन्नो को टटोले तो बांग्लादेश की किस्मत को मुग़ल काल के राजाओं ने शतरंज के खेल की बाजियों में सिमित कर के रख दिया था.हकीकत ये है की मुगलकाल में एक रियासत थी कूचबिहार’ और उसका सीमावर्ती राज्य था रंगपुर. कूचबिहार का राजा और रंगपुर का नबाब दोनों शतरंज के खेल के शौक़ीन थे. जब भी कूचबिहार’ के राजा और रंगपुर के नबाब में शतरंज की बाजी लगती वो दांव पर अपने अपने रियासत के एक गांव लगाते थे. कई सालो बाद इस शतरंज के खेल ने उन रियासतों का भूगोल बदल के रख दिया. अब कूचबिहार’ के राजा द्वारा जीते गए कई गाँव रंगपुर की सीमा थे और रंगपुर के नबाब द्वारा जीते गए कई गाँव कूचबिहार’ की सीमा में थे.

जब भारत आजाद हुआ तो कूचबिहार’ भारत में और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में शामिल हो गया. कालांतर में हिन्दुस्थान के सहयोग से बांग्लादेश बना और भारत बांग्लादेश सीमा का निर्धारण हुआ. अब समस्या पुनः उसी प्रकार रह गयी की रंगपुर (जो बांग्लादेश के हिस्से में आया ) के राजा द्वारा जिते हुए गांव जिन पर बांग्लादेश का अधिकार था वो गाँव भारत की सीमा के अन्दर आ गए और वो गाँव चारो ओर से भारत से घिरे थे.इन्हें वर्तमान में बांग्लादेशी इन्क्लेव” कहा गया. ठीक इसी प्रकार कूचविहार(जो भारत के हिस्से में आया ) के राजा द्वारा जीते गांव जिनपर भारत का अधिकार थावो बांग्लादेश की सीमा के अन्दर आ गए और चारो ओर से वो बांग्लादेशी गांवों से घिर गए थे.बांग्लादेश की सीमा के अन्दर इन भारतीय अधिकार के क्षेत्रों को भारतीय इन्क्लेव” कहा गया . जबसे बांग्लादेश बना सीमा निर्धारण में दोनों तरफ के ये गाँव समस्या बने हुए थे इसलिए भारत बांग्लादेश बार्डर पर उस क्षेत्र में फेंसिंग(बाड़ लगाने का कार्य) हो नहीं पाता था और सीमा को PORAS BORDER(छिद्रित सीमा) कहा जाता था. अब न तो भारत के लिए संभव था की बांग्लादेश से चारो ओर से घिरे हुए भारतीय इन्क्लेव” में सड़क बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पंहुचा पाए और बांग्लादेश इस नाम पर उन क्षेत्रों में कुछ नहीं कर सकता था की वो भारत के क्षेत्र हैं. ठीक इसी प्रकार बांग्लादेश के लिए संभव नहीं था की भारत से चारो ओर से घिरे हुए बांग्लादेशी इन्क्लेव” में सड़क बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पंहुचा पाए और भारत इस नाम पर उन क्षेत्रों में कुछ नहीं कर सकता था क्यूकी वो बांग्लादेश के अधिकार क्षेत्र हैं।
यहीं से घुसपैठ और सीमा पर गोलाबारी का क्रम शुरू होता था. भारत के क्षेत्र में जो बांग्लादेशी इन्क्लेव” थे उन में न तो बिजली थी न सडक न पानी न पुलिस न कानून. सारे अवैध धंधे और आतंकवाद के अड्डे भारत की सीमा में चल रहे हैं और भारतीय पुलिस और सेना सामने देखते हुए हाथ पर हाथ धरे हुए थी क्यूकी वो बांग्लादेशी क्षेत्र है,उसमें नहीं जाया जा सकता है. अवैध बांग्लादेशी घुसपैठीयों ने इन बांग्लादेशी इन्क्लेव को लांचिंग सेंटर बना रक्खा था और यहीं से वो घुसपैठ कर जाते थे. नकली नोटों की फैक्ट्री खुलेआम चलती थी क्युकी भारतीय सेना या प्रशासन कुछ नहीं कर सकता पडोसी देश के क्षेत्र में. उधर बांग्लादेश में भारतीय एन्क्लेव में रहने वाले भारतीयों की दुर्दशा भी थी.बांग्लादेश उन्हें अपना मानेगा नहीं और भारत वहां तक पहुच नहीं सकता हर साल इन भारतीय इन्क्लेवो एवं बंगलादेशी इन्क्लेवो के नागरिक कई सौ की संख्या में या तो बांग्लादेश राइफल्स या भारतीय सेना के हाथो,इस बार्डर के सीमांकन के संशय में मारे जाते थे. जिस किसी भी देश की सेना ने सीमा पार करते अवैध नागरिक को देखा वो उसे गोली मार देती थी और सुविधाओं के आभाव में ये नागरिक सीमा पार मज़बूरी में करते थे . इन क्षेत्रों में रहने वाले को यदि दाल या चीनी खरीदने बगल की दुकान में जाना हो तो पासपोर्ट और वीजा चाहिए...
एक तरीके से देखें तो इन सभी इन्क्लेववासियों के लिए पहचान का संकट था की वो भारत में रहते हुए भारतीय नहीं हैं और कुछ बांग्लादेश में रहते हुए बांग्लादेशी नहीं हैं. ये विवाद बांग्लादेश बनने के समय भी ऐसे ही रह गया . इंदिरा गाँधी ने शेख मुजीब के साथ सन १९७४ में ही समझौता किया मगर विभिन्न कारणों से भारत के संसद की मुहर नहीं लग पायी.मनमोहन सिंह सरकार ने इस विवाद के निपटारे के लिए इन इन्क्लेवों के अदला बदली के प्रस्ताव पर कुछ कार्य किया परन्तु पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रबल विरोध,घुसपैठ रोकने के मुद्दों पर विपक्ष की असहमति एवं सोनिया गाँधी के ऊपर अतिनिर्भरता के कारण मनमोहन सिंह इतने बड़े ऐतिहासिक फैसले को चाहते हुए भी नहीं अमल कर पाए जिसे नरेंद्र मोदी के सशक्त नेतृत्व ने दोनों देशों के पक्ष और विपक्ष दोनों को साथ ले कर कर दिखाया. समझौते के अंतर्गत बांग्लादेश की सीमा पड़ने वाले सभी 111 भारतीय इन्क्लेव बांग्लादेश के हो जायेंगे और भारत की सीमा में पड़ने वाले 51 बंगलादेशी इन्क्लेव भारतीय क्षेत्र के हो जायेंगे..
भारत के लिए क्यू जरुरी था ये समझौता : भारत सरकार की सबसे बड़ी समस्या अवैध बंगलादेशी थे जो हर रोज स्थानीय सहयोग और सीमा के पोरस होने के कारण ट्रको से भर के आ जाते थे और भारत में जनसँख्या असंतुलन पैदा कर रहे थे. मोदी ने चुनावों में भी ये मुद्दा उठाया था. अब भारत सरकार के लिए सीमांकन बिलकुल स्पष्ट हो गया और इन 51 इन्क्लेवों में चलने वाले आतंवाद के अड्डेघुसपैठ के सेंटर,नकली नोट की फैक्ट्री को भारतीय सेना घुस कर आसानी से बंद करा सकती है और हर साल होंने वाली लाखों बांग्लादेशी घुसपैठ ख़तम हो जाएगी. पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी आतंकियों का सफाया अब भारत सरकार के हाथ में होगा.अब ऐसा संभव नहीं की कोई भारतीय क्षेत्र में बम फोड़करमर्डर,लूट या बलात्कार करके बगल के गांव में भाग जाए और पूरी भारतीय सेना और सुरक्षा एजेंसिया हाथ पे हाथ धरे रहें क्यूकी वो बांग्लादेशी इन्क्लेव में भाग गया है..शायद इसीलिए इस समझौते को बर्लिन की दिवार गिरने” जैसा माना जा रहा है और वास्तव में ये कहीं उससे भी बड़ा समझौता है.. कई अपरिपक्व आलोचक आलोचना का मुद्दा भारतीय इन्क्लेव के क्षेत्र को बना रहे हैं की भारत को कम भूमि मिली परन्तु एक तथ्य ये भी है की सामरिक दृष्टी से भारत अत्यंत ही शक्तिशाली होगा. पूर्व में कई सरकारों ने सीमा पर भूमि के छोटे स्तर पर कई लेन-देन सीमा पर किये समझौते के बदले ही बांग्लादेश ने चीन द्वारा बनाये गये दो बंदरगाह भारत को सौप दिए जो की सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
आशुतोष की कलम से

अगले लेख में: बांग्लादेश के लिए क्यों जरुरी था ये समझौता और भारत को अपेक्षाकृत कम जमीन मिलने की भरपाई और किस प्रकार से की गई है ।



रविवार, 13 जुलाई 2014

रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश- एक सही निर्णय??( FDI IN DEFENCE)

पिछले कुछ दिनों से एक बहस छिड़ी है की रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश(FDI) को जो अनुमती दी गयी है उससे देश का फायदा होगा या नुकसान.हालांकि रक्षा विशेषज्ञ इस पर एकमत दिख रहे हैं.आगे का लेख लिखने से पहले मैं आप स्पष्ट करना चाहता हूँ की स्वयं में मैं स्वदेशी का एक प्रबल समर्थक हूँ और दूसरा की ये लेख नरेंद्र मोदी सरकार की किसी नीति को सही ठहराने के उद्देश्य से नहीं लिख रहा हूँ,इस काम के लिए भारतीय जनता पार्टी के पास काफी प्रबुद्ध प्रवक्ता हैं. वापस मुद्दे पर आते हुए रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश के पक्ष या विपक्ष में तर्क करने से पहले हमे कुछ रक्षा सम्बन्धी जरूरतों और उसके आपूर्ति के प्रबंधन के बारे में समझना होगा. पिछले बीस-पच्चीस साल में रक्षा क्षेत्र में अगर बड़ी आपूर्ति के नाम पर रुसी नेवी द्वारा रिटायर किया हुआ एडमिरल गोर्शकोव नामक युद्धक पोत(जिसे बाद में स्वदेशी नाम आईएनएस विक्रमादित्य दिया गया ) और मुलायम सिंह के रक्षामंत्री रहते हुए सुखोई विमानों की खरीद है, जो पूरी तरह से बिदेशी खरीद थी.
आजादी के बाद ही किसी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में शोध और उत्पादन को बढ़ावा नहीं दिया इसी कारण 1962 की हार के बाद से अब तक चीन से हमने आँख मिलाने की हिम्मत नहीं की और अपना प्रमुख प्रतिद्वंदी पाकिस्तान जैसे पिद्दे से देश को मान लिया जो पहले से ही गृहयुद्ध के कारण तबाह है. इधर पच्चीस सालो में सामरिक रूप से चीन ने हमे चारो और से घेरते हुए मुलभूत ढांचे में अत्यंत तीव्र गति से विकास कर लिया है.जिस चौकी तक हमारे सैनिको को पहुचने में 3 दिन लगेगा चीन ने वहां तक रोड बना के 4 घंटे में सप्लाई का प्रबंध कर दिया है. जब चीन से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो भारत की स्थिति शायद कही नहीं ठहरती है . चाहे हमारे तोप हो मिसाइल हो, जहाज हो या नेवीवारशिप सबमे चीन हमसे काफी आगे है.और यही बात किसी भी रीढ़वाली राष्ट्रवादी सरकार को पीड़ा देगी की वो अपने पडोसी के सामने घुटने टेकते हुए घिसट रहा है क्यूकी संसाधन नहीं उपलब्ध नहीं  हैं. विश्व की सबसे बहादुर सेना हताश निराश है क्यूकी उसके पास लड़ने के लिए बंदूके नहीं हैं.यह बात पूर्व सेना प्रमुख के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र से स्पष्ट है. अब यदि वर्तमान सरकार स्वदेशी फैक्ट्रियां डाल कर विमान युद्धपोत और अन्य रक्षा उपकरण बनाने लगे तो कम से कम यह 25 साल की परियोजना होगी. इस समय अंतराल की वास्तविकता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं की लगभग  बीस साल से स्वदेशी विमान “तेजस” का निर्माण जारी है और आज तक वह विमान वायुसेना के मानको को पूरा नहीं कर पाया है जिससे उसकी सेवाओं का उपयोग भारतीय वायुसेना कर सके. इसमें 6 साल आदरणीय वाजपेयी जी के कार्यकाल के भी है जिनकी सरकार विकास सम्बन्धी फैसले में अव्वल थी.उस पर भी ध्यान देने योग्य बात ये है की इस विमान का इंजन बिदेशी है जिस पर हिन्दुस्थान का ठप्पा लगाया जायेगा .तो आप कल्पना कीजिये बिना इंजन के सिर्फ नियंत्रण प्रणाली और ढांचा पिछले बीस साल से बन रहा है सफल नहीं हुआ अगर इस आधार पर चीन से आँख मिलाने की परिकल्पना करे तो शायद पूरा पूर्वोत्तर भारत चीन के हवाले करना पड़ेगा और हमारी आँख फिर भी नीचे रहेगी.
इससे इतर जो बड़ी समस्या है की काल्पनिक रूप से यदि इतना बड़ा तंत्र खड़ा कर लिया जाये तो उसके लिए पैसे कहाँ से आयेंगे.जाहिर है इस पर ये कहना की कालेधन को स्विट्जरलैंड से माँगा कर रक्षा का आधारभूत ढांचा तैयार होगा एक कोरी कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं हैं. काल्पनिक रूप से ये भी मान ले की वित्त का प्रबंध हो गया तो क्या हमारे पास उस उच्च स्तर की तकनीकी और प्रशिक्षित प्रतिभाएं हैं . एक रक्षा विशेषज्ञ से संवाद के दौरान उन्होंने एक बहुत मौलिक प्रश्न उठाया की यदि भारत ने तेजस जैसे विमान की एक फैक्ट्री विकसित भी ले तो सिर्फ 100 विमानों के लिए विमान निर्माण का ढांचा नहीं बनाया जा सकता उसके बाद उसे ग्राहक कहाँ से मिलेंगे क्यूकी बिना शोध के हमारी तकनीकी 30 साल पुरानी होगी और रूस और फ़्रांस जैसे बड़े उत्पादक उससे कम दाम में उच्च तकनीकी उपलब्ध करा देंगे.
नासा या अन्य देशों में हमारी प्रतिभाएं सफल है क्यूकी वहां का शोध का आधारभूत ढांचा अत्याधुनिक एवं विश्वस्तरीय है.वहां सिर्फ हमारी प्रतिभाओं को मूल्य संवर्धन (VALUE ADDITION) करना है,जबकि इसके उलट भारत में पूर्ववर्ती सरकार की उपेक्षा के कारण शोध(RESEARCH) का आधारभूत ढांचा न के बराबर है. हमारी समस्या यही है की हम खीच खांच के घरेलू उत्पादन के बजट का जुगाड़ कर लें तो शोध के नाम पर “ऊंट के मुह में जीरा”. जबकि शोध और उत्पादन दोनों दो स्तर हैं एक विश्वस्तरीय उत्पाद के लिए. और उसमे भी सबसे प्रमुख है भारत में शोध क्षेत्र में काम न होना.सर्वप्रथम सरकार प्रथम स्तर पर कार्य कर ले फिर दूसरे स्तर उत्पादन पर कुछ सोचा जा सकता है..तो क्या जब तक ये सब स्तर हम प्राप्त न हो हम कोई भी उत्पाद बिदेश से न मंगाए या बिदेश पर निर्भर न रहे और अपने सैनिको और जनता को कांग्रेस के शासन काल की तरह मरने के लिए छोड़ दें?मेरी समझ से कोई भी ये नहीं चाहेगा की संसाधन की कमी से हमारे वीर सैनिक और निर्दोष जनता मारी जाये तो फिलहाल एक ही विकल्प बचता है बिदेश से रक्षा उपकरणों की खरीद और यही हम न्यूनाधिक मात्रा में कर भी रहे हैं. शोध और निवेश के अलावा रक्षा मोर्चे पर बिदेशों से रक्षा उपकरण मंगाने एवं FDI को हरी झंडी देने के पीछे दो और प्रमुख कारण हैं जिसे ज्यादातर लोग नजअंदाज कर रहे हैं प्रथम है तकनीकी स्थानान्तरण(Techonology Transfer) तो दूसरा है उपकरणों के मरम्मत सम्बन्धी कलपुर्जे (Spare Part) के व्यापार का खेल.
हम जितने भी देशों से रक्षा उपकरण आयात करते हैं उसमे से रूस को छोड़कर कोई भी देश तकनीकी  स्थानान्तरण(Techonology Transfer) नहीं करता है. मतलब हमने कोई उपकरण ख़रीदा तो एक तकनीकी दल उसके प्रचालन की रखरखाव ट्रेनिंग ले कर आएगा और कंपनी ने अपना पल्ला छुड़ा लिया. अब यदि वही कंपनी यहाँ फैक्ट्री बनाती है तो हमारी सरकार का उसपर पूर्ण नियंत्रण होगा क्यूकी उसका निवेश हिन्दुस्थान में लगा होगा तो हमारी रक्षा व्यवस्था के साथ सहयोग को अस्वीकार करना आसान नहीं होगा.दूसरी और ऐसा संभव नहीं है की फैक्ट्री की सम्पूर्ण जनशक्ति (मैनपॉवर) बिदेश से आये.यहाँ फैक्ट्री होगी तो उस तकनीकी में हजारो भारतीय भी दक्ष होंगे ज्ञातव्य हो ये तेल साबुन बनाने की तकनीकी नहीं होगी,ये तकनीकी रक्षा उपकरणों से सम्बंधित होगी. जो आगे हमारे व्यवस्था के स्वदेशीकरण में लाभदायक होगा. हमारी सरकार का इस बात पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा की यहाँ से सस्ती जनशक्ति और संसाधन लेकर माल यहाँ बना कर अन्य देशों में न बेचा जाये मतलब हिन्दुस्थान में लगी फैक्ट्री का अधिकांश उत्पादन यही के लिए होगा.शोध कार्य वो अन्य इकाईयों(subsideries)के माध्यम से कर के यहाँ उपयोग कर सकते है.
रक्षा उपकरणों के मरम्मत सम्बन्धी कलपुर्जों का एक बहुत बड़ा बाजार सक्रीय है जो एक बार उपकरण खरीद लेने के बाद कलपुर्जों के नाम पर मनमाने ढंग से मोटी रकम हिन्दुस्थान से वसूल करता है.जैसे सुखोई विमान हमने रूस से लिया उसका नोज संयुक्त रूस के किसी अन्य भाग में बना इंजन कही और ढांचा कहीं और बाकी उपकरण कही और. आज भारतीय वायु सेना के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है की रूस के विघटन के बाद उसे अलग अलग देशों से स्पेयर पार्ट खरीदने पड़ते हैं.कुछ देशों ने फैक्ट्रियां बंद कर दी अब किसी भी कीमत पर वो कल पुर्जे नहीं मिल सकते और सुखोई विमान उड़न ताबूत बन चुके हैं.यदि ये स्पेयर पार्ट हिन्दुस्थान में उपलब्ध होते तो कई हजार करोड का फायदा एवं कई विमानों की आयु बढ़ सकती थी. यही हाल अन्य रक्षा उपकरणों में भी है.
एक अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु ये है की यदि सामान यहाँ बना तो बिदेशी मुद्रा भंडार बचेगा जो वर्तमान अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है और उतनी ही पूंजी में हमें ज्यादा उपकरण मुहैया होंगे जिनके उत्पादन प्रक्रिया पर भारत सरकार का पूरा नियंत्रण अपने विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से होगा.इसके अलवा कुछ संशय इस बात पर हैं की हमारा पूरा रक्षा तंत्र बिदेशियों के हाथ में चला जायेगा तो यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है विदेशी निवेश कभी भी कोर सेक्टर जिससे देश की सुरक्षा में समस्या आ सकती है उसमे नहीं होता है. अभी फिलहाल में तो ये पेरिफेरल सेक्टर में है. जैसे नाईट विजन उपकरण आदि. कोई भी उपकरण खरीदने के बाद भारतीय रक्षा तंत्र अपनी आवश्यकता के अनुसार उसमे परिवर्तन करता है जिससे किसी अन्य देश को जो उसी उत्पादक कंपनी से वही उपकरण लेता है,उससे हमारे उपकरण के कोर आपरेशन की गोपनीयता कुछ स्तर तक बनायीं जा सके.



जहाँ तक राजीव भाई के विचारों के समर्थन करने वाले बंधुओं का सवाल है राजीव भाई ने स्वयं अपने व्याख्यानों में शून्य तकनीकी उत्पादों जैसे तेल मसाला साबुन आदि में बिदेशी निवेश का विरोध किया है . उन्होंने स्वयं अपने व्याख्यानों में कहा है की कोई भी बिदेशी कंपनी भारत में मिसाइल या कोई रक्षा उपकरण बनाने की फैक्ट्री क्यों नहीं लगाती?? यदि आज उनकी बात को आंशिक रूप से सत्य किया जा रहा है तो इसका निषेध क्यों?? स्वदेशीकरण धीमी गति से चलने वाली लम्बी प्रक्रिया है. जो पांच साल में नहीं हो सकती हाँ मगर वर्तमान सरकार को सामानांतर रूप से स्वदेशी तकनीकी पर शोध को पर्याप्त अवसर देना होगा तथा ऐसे व्यवस्था की नींव रखनी होगी जिससे आने वाले दशक में हिन्दुस्थान कम से कम अपनी रक्षा जरूरतों का कुछ भाग में स्वावलंबी हो सके..

आशुतोष की कलम से 
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